ऐसा नही है कि मैं इस अवसर का सदुपयोग नही करना चाहता लेकिन मेरे मष्तिस्क मे तीन अलग-2 विषय चल रहे हैं !
i.) हिन्दी और पाश्चात्य सभ्यता का हिन्दी पर प्रभाव
ii.) मेरा AID के साथ अनुभव
iii.) Volunteering का मक्सद - एक सच
फिर सोचा,क्यों न तीनों विषयों पर अपना दृष्टिकोण पेश करूँ !
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मुझे अंग्रेजी (English) भाषा के प्रयोग से कोई व्यक्तिगत दुख हो ,बल्कि मेरा तो मानना है कि अंग्रेजी सर्वमान्य वैश्विक (ग्लोबल ) भाषा का दर्जा पा चुकी है ! और आज जब तकनीक और विकास ने राष्ट्र की सीमाओं को समाप्त सा कर दिया है तो एक सर्वमान्य वैश्विक भाषा का उदगम अवश्यंभावी है !
इस दृष्टिकोण से अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य सा लगता है ,लेकिन याद रहे कि “हिन्दी” हमारी मातृ भाषा है ! और अगर बडे शहरों के तथाकथित बडे शिक्षा संस्थान से पढा-लिखा नौजवान/ नवयुवती यह कहे कि “ मुझे हिन्दी पढने,लिखने या बोलने में कठिनाई होती है “ तो यह हमारी राष्ट्रीय सभ्यता व संस्कृति पर आघात है !
मैं कई ऐसे व्यक्तियों को जानता हूँ जो हिन्दी का उच्चारण भी अंग्रेजी की तरह करते हैं , और अंग्रेजी को उच्च भाषा का दर्जा देते हैं ! जबकि मेरा ऐसा मानना है कि
प्रत्येक भाषा अपने आप में महान होती है चाहे वह मूक – बधिर व्यक्ति की “ इशारों वाली भाषा “ ही क्यों न हो !
उपरोक्त वर्णित द्वितीय विषय के बारे में मेरा मत है कि AID (Association for India’s Development – हिन्दी में “भारत विकास संगठन” ) के साथ कार्य करके एक सबसे बडी बात मैं जाना हूँ ,कि हम AID से जुडे युवा, जो कि शिक्षा ,रोजगार,परिवार और समाज के दबावों को ढोते हुए ,हर क्षण अलग-2 सैकडों प्रतियोगिताओं और बाध्यताओं के बावजूद ,एक सकारात्मक मानसिकता से ग्रसित हैं ! ऐसी मानसिकता जो समाज और राष्ट्र के लिये हितकारी है ! यह मानसिकता है “ विकास की मानसिकता “ , “ समाजिक परिवर्तन की मानसिकता “, और अगर सही शब्दों में बोला जाय तो यह मानसिकता
“कमाल” कर सकती है अगर राष्ट्र का हर नागरिक इस मानसिकता का अनुग्रहण करे !
मैं AID का धन्यवाद करूँगा कि मुझे ऐसा मंच प्रदान किया,जहाँ मैं कई ऐसी मानसिकता वाले युवाओं से मिला ! लेकिन एक बात की तरफ मैं ध्यान खींचना चाहुँगा, कि मानसिकता से ज्यादा मह्त्त्वपूर्ण हमारे कृत्य ( या कर्म ) हैं जिनसे हम सही मायनों में एक “समाजिक परिवर्तन “ बन सकते हैं

“Helping hands are better than praying lips!!!! “
अगर सारांश निकालूँ तो यही कहुँगा कि Volunteering करने की पीछे हमारा असल मक्सद केवल हम ही जानते हैं परंतु अगर हम “ समाजिक परिवर्तन “ बनने में सूक्ष्मतम भागीदार भी न बन सके तो यह एक Volunteer की सफलता नही मानी जा सकती !!
Darshan Mehra
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