दिसंबर महीने का इश्क ..

on Friday, December 11, 2015

कालेज के शुरुवाती दिन हों और वो अभी तक क्लास की सभी लड़कियों के व्यवहार , व्यक्तितत्व का असेसमेंट ही कर रहा हो और अचानक उसको वो शांत रहने वाली लड़की पसंद आने लगे और उससे भी ज्यादा की लैब में प्रॅक्टिकल्स के दौरान वो दोनों एक ही बैच का हिस्सा बन जायें ,उसका सौभाग्य ही मानो ..लैब में कभी वे साथ वेल्डिंग कर रहे होते ,कभी मोटर की स्पीड माप रहे होते और कभी उन प्रॅक्टिकल्स के दौरान ही डम्ब-शैरॉड के कॉम...्पिटिशन की तैयारी ..परिस्थितियां खुद रिश्तों के रूप व आकार का निर्माण करती हैं ..
हॉस्टल में जाकर परम मित्र के एडवांस कम्प्यूटर जिसमें 256 MB की रैम आयी है पर कभी वो दोस्तों के साथ "देवदास" मूवी देखता कभी "रहना है तेरे दिल में" तो कभी जगजीत की गजलों में "इश्क कीजे फिर समझिये ,जिंदगी क्या चीज है " सुनते हुए जीवन की सार्थकता को मुह्हब्बत के चश्मे से ढूंढने की कोशिश करता ..मुह्हब्बत की खूशबू आने लगती जब भी वो उससे मिलती .. लड़की 80% नंबर लाती और वो 62 % ..उसको ज्ञात था की इतने प्रतिशत जिंदगी की गाड़ी धकेलने को प्रयाप्त हैं ..ऐसे ही पास होते हुए कालेज के आख़िरी साल हो चला ..वो चाहता तो था इजहारे इश्क करना पर साले की नब्ज कमजोर पड़ जाती थी ..कोशिश की थी जरूर , पर तीनों बार हिम्मत के गुब्बारे की हवा निकल गयी ..
आख़िरी सेमेस्टर था उसका कमीना दोस्त ज्यादा जिगरी हो गया था ..हॉस्टल के उसी कमरे में उसका दोस्त बोलता "साले कोई रिग्रेट लेकर मत जाना कालेज से " दोनों दोस्तों की सोच साला कितनी ज्यादा मिलती थी ..हर बात पर ..256 MB रैम वाले कम्प्यूटर से चित्रा सिंह गा रही होती "दिल~ए~नादाँ तुझे हुआ क्या है ,आखिर इस दर्द की दवा क्या है "


अगले दिन वो लड़की को लाइब्रेरी बुलाता और इजहारे इश्क तो पता नहीं पर ये जरूर कह आता की तुम दोस्त से काफी बढ़कर हो..आई लाईक यू .. और बदले में मेरी तुमसे कोई एक्सपेक्टेशन नहीं है ..कालेज के वे आख़िरी 3 महीने दोस्ती से ज्यादा वाला इमोशन का प्ले ग्राउंड बन जाता ..कालेज के आख़िरी दिन से पहली रात तकरीबन 2 बजे लड़की का sms आता " आई विल मिस यू :( "

नौकरी ढूढ़ने की जद्दोजहद लड़के और लड़की दोनों को एक ही शहर में अपने-2 रिश्तेदार के यहाँ पटक देते ..शहर का विस्तार जितना बड़ा था लोगों की जिंदगी उतनी सिमटी ..उस शहर में रहते पर वो मिल नहीं पाते ..केवल फोन का आसरा होता ..रिलाइंस के sms पैक को दोनों निचोड़ लेते. तकरीबन एक दिन के 400 sms आदान-प्रदान करने में.. "आई मिस यू" से "आई लव यू" और "आई लव यू टू" तक का सफ़र शुरू होता ..मिलने को तड़पन होती पर लड़की जिन रिश्तेदार के वहां रहती वहां से बाहर निकलना और मिलने की हिम्मत करना बस की नहीं थी ..ऊपर से नौकरी की खोज की उधेड़बुन .. लड़की की नौकरी किसी बड़ी कंपनी में लग जाती लड़के की किसी फैक्टरी में ..मिलने के लिए 200 किमी दूर कालेज जाना तय किया जाता ..लड़की का परिवार भी उस शहर के पास ही रहता ..इश्क की कमजोरियां और मजबूतियाँ के दौरान ऐसे ही निर्णय होते हैं जिनमे पागलपन हो और जिनको क़ोई तीसरा निरर्थक समझे,पर इश्क तो इश्क है ,पागलपन न हो तो काहे का इश्क ..एक मुलाक़ात के लिए 200 किमी दूर जाना तय रहा..

कालेज से डिग्री लेने की कोई खुशी नहीं थी मगर वो 3 घंटों की खुशी थी जो उन्होंने कालेज के अंदर अल्हड से इश्क की छतरी के नीचे बिताये..कुछ कुछ धुंधले सपने देखे ..लड़के ने पहली तनख्वाह से खरीदी ब्लैक पैंट और लाइट पीच कलर हाल्फ शर्ट पहनी थी और लड़की ने उस ड्रेस की दो बार तारीफ़ की ..वो फूला नहीं समाता पर जाहिर भी न करता ..कालेज के इतने सारे पेड़ों पर उन दोनों को नए फूल खिलते से नजर आने लगे हैं ..पर चार साल में पहले तो ऐसे कोई फूल थे नहीं वहाँ ..शायद हवाओं में बहती खूशबू भी इन फूलों की हो ..नहीँ वो तो इश्क की हवाएँ हैं .. अलविदा बोला और ये डिसाईड हुआ की सुबह इकट्ठे एक ही बस में चलेंगे ..लड़का दोस्त के घर चला गया और लड़की अपने ..


अगली सुबह दोस्त भी 4 बजे उठा स्कूटर पर लड़के को बस अड्डे छोड़ा और गले मिल के कुछ बिना कहे काफी कुछ कह गया ..इश्क के रास्तों में बहनें और दोस्त ऐसे होते हैं जैसे टेस्ट मैच में लोअर आर्डर का बैट्समैन ,रन आपको ही बनाने होते हैं मगर उनको अपने विकेट बचाई रखनी होती है ..आपकी इश्क की सेंचुरी में उनका ज्यादा योगदान होता है..गंगाजी को छूं कर आयी सर्द सी हवा सुबह 4 बजे जैसे जिंदगी के अहसासों को परालौकिक सा करती महसूस कर रहा था वो .. बस में दो टिकिट लेता और कंडक्टर को बोलता की एक सवारी अगले शहर से बैठेगी ..लड़की वहाँ इस टेंशन में है की कैसे उसी बस को पकडे ..साथ में छोड़ने आये गुस्सैल पापा भी हैं ..बस स्टॉप पर बस रुकी कंडक्टर चिल्लाया बुलाओ जी अपनी सवारी ..वो खामोश है ..आज भी वही हाफ शर्ट पहन आया जानबूझकर ..हाँ लाईट पीच कलर की ..लडकी के पापा की कंडक्टर से कुछ तो लड़ाई हो गयी है ..वो चुपचाप बैठा है "प्रेम के ईश्वर " से प्रार्थना करता ..प्लीज उसके पापा के गुस्से को शांत करवा दो और लड़की को बस में आने दो..बस छूटने ना पाय ..आखिरकार वो आयी ..दोनों की नजरें मिली मगर बोले नहीं अनजान बने रहे पापा भी आये थे न सामान चढाने ..पापा चले गए ..कंडक्टर चिल्लाया ..आपकी सवारी नहीं आयी ..लड़का बस इतना बोला की "चलो " .. लड़की आकार अब उसके बगल वाली सीट पर बैठ गयी है ..दोनों ने गहरी सांस ली ..थोड़ी बहुत बातें हुई ..अचानक से जीवन इतना रंगीन सा होने लगी ..सर्दियों में बर्फ पडने के दो-एक दिन बाद की धूप सी ..रातों को चमेली के पेड़ के नीचे की खुशबू सी ..बरसात के दिन के बाद रात को चमचमाते आसमाँ सी ..लड़की ने धीरे से पूछा की कोई दुसरी शर्ट नहीं लाये थे ..लड़का सिर हिलाते हुए झूठ बोलता "नहीं"

लड़की उसके कंधे पर सिर रखे भविष्य की अनिश्चितताओं का जिक्र करती और लड़का सर्दी की उस धूप समाँ गर्माहट को ज्यादा से ज्यादा ताप लेने की कोशिश .. दोनों को बिलकुल भी नहीं पता था की भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है पर दोनों को ये जरूर पता था की ये सफ़र ये समय अपने आप में सम्पूर्णता की छाप छोड़ेगा .. लड़का उन धुंधले सपनों में गुम खुद ही खुद में मुस्कुरा रहा है और लड़की धीरे से उसकी पीच कलर की हाफ शर्ट पर कहीं तो बाएं कंधे के पास चुपके से सेकण्ड के दसवें हिस्से से भी कम समय के लिए उसे चूम लेती है ..वो सोचती है की उसे खबर नहीं हुई और वो जानता है इस बात को ,इसलिए उस एक बटा दस सेकेण्ड के अहसास को महसूस होते हुए भी ऐसा व्यक्त करता है जैसे उसको पता नहीं चला ..ये बस का सफ़र और ये समय इस तरह कई पड़ाव पार करते एक दिन थम जाता है ..

दिसंबर महीने की भी अपनी कोई अलौकिक खुशबू होती है ..

इरा ...

कुछ अजनबी आपको जीवन के कई गुर देकर जाने कहाँ ग़ुम हो जाते हैं .. जहाँ हम क्लाइंट के डेटा को सिक्योर करने की बात कर रहे होते अचनाक वो बोला " दर्शन माय फ्रेंड ,किड्स आर द मोस्ट ब्यूटीफुल पार्ट ऑफ़ ए मैरिज " , उसके घर "सरस्वती ने जन्म लिया है .. लक्ष्मी कहना थोडा खटकता है मुझे ..बच्चे के जन्म से ही धन-धान्य का प्रतीक बनाना खटकता सा है ..वैसे भी हॉस्टल पहुँचने के बाद जब पापा जी ने पूछा की कल वापस जाते व...क्त एक बार फिर आऊंगा तो कुछ और सामान लाना तो नहीं है ...??
हाँ ले आईयेगा "एक छोटी सीे माँ सरस्वती का फ़ोटो फ्रेम और एक लोहे का संदूक " .. माँ सरस्वती तब से अपने लिए इक कोना उसके बाद से मेरे हर घर में ढूंढ़ के विराजमान हो हीं जाती हैं ..मैं कहना चाह रहा था की सरस्वती जी के लिए मैं थोड़ा बायस्ड हूँ ..

सच है बच्चे शादी का सबसे सुन्दर हिस्सा हैं बल्कि जीवन का भी.. कई सालों के निरर्थक विचारों का एन्ड-प्रोडक्ट ये निकला की जीवन के शायद ये तीन मूल उद्देश्य हैं ..

i. क्वालिटी सर्वाइवल ( जीवन शैली-सिर्फ भौतिक मापदंडों से मतलब नहीं ) 
ii. री-प्रोडक्टिविटी ( प्रकृति को ऋण वापसी ;))
iii. ब्रह्म प्राप्ति ( वो क्या कहते हैं हां ,आत्मा से परमात्मा का मिलन )

अब प्रभु तो कैसे मिलेंगे इसका प्रयास परस्पर जारी है और अनिश्चित है , बाकी दो टिक लगते नजर आ रहें हैं यहाँ .. जी हाँ सही समझे , शादी का सबसे सुन्दर हिस्सा यानि बच्चे और एक ऐसे ही ईश्वरीय देन का जन्म हुआ है मेरे यहाँ .. अभी खुशी और नई जिम्मेवारी की द्वीतरफा ढोलकी बजा रहा हूँ मैं .. ईश्वर के बाद अगर किसी को सबसे ज्यादा धन्यवाद मैं कहना चाहता हूँ तो वो है मेरी आत्मीय दोस्त ,हमसफ़र और पत्नी Poonam ..
 
जितनी सिंसरिटी और आत्मीयता से तुमने पिछले 8-9 महीनों में खुद का और इस नये जीवन का ख्याल रखा है उससे मेरा सभी "माँओं " के लिए कर्तज्ञता व सम्मान कई गुना बढ़ गया है ...
मौक़ा दार्शनिक होने का कपितु नहीँ है पर विचारों को जिन्न की तरह बोतल में समेट कर रखना नामुमकिन है  :)...

"मेघालय" में "गारो" कम्युनिटी अचानक से सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी लगने लगे हैं मुझे.. इस कम्युनिटी में "माँ" परिवार की मुखिया होती है ..और पुरुष-प्रधान समाज के एकदम उलट जीवन शैली .. बरसों पुराने लोहे के संदूक के एक कोने पर छिपा के रखा हुआ यक्ष-प्रश्न है ये .. "पुरुषों को क्यों और किसने परिवार का मुखिया या फिर डिसीजन-मेकर का ओहदा दिया होगा ?? ओबएश्ली पुरुषों ने खुद ही दिया होगा ..
माँ न केवल 9 महीने तक अपने गर्भ में बच्चे को बाहरी दुनिया की चिलचिलाती धूप समान यथार्थ के ताप से छाया प्रदान करती है वरन उस बच्चे के बडे होने तक हर पल उसका दुखहर्ता-सुखकर्ता बनके "जगदीश हरे" बनी रहती है .. पुरूषों से कोई शत्रुता नहीं है मेरी,पर पारिवारिक जिम्मेदारी का जितना लोड महिला उठाती है पुरुष उस अनुपात में कहीं कम .. और जब दोनों पति-पत्नीे प्रोफेशनल हैं तो समान आर्थिक जिम्मेदारी भी महिला निभातीे है तो ये और भी आवश्यक सा लगता है की क्यों ना "गारो जनजाति" सा महिला प्रधान समाज का शुभारम्भ किया जाय :)..फेमिनिस्ट नहीं बोलिए जस्ट निजी विचार ..खैर इस विषय पर फिर कभी .. अभी तो सिर्फ इतना " मेरे घर आयी एक नन्ही परी "

शुक्रिया खुदा और पूनम :)

( .."अब ये मत समझना की इस मुश्किल क्षण में मैं ये सब लिख रहा हों कुछ दिन पहले ही तैयारी कर ली थी" ..

18th अक्टूबर ..

कुछ तो स्पेशल है इस डेट में .. 18th अक्टूबर ..अगर आपको पूछा जाय की जिंदगी का एक दिन बताओ जो सबसे बड़ा माईल स्टोन हो तो हमारे लिए तो यही दिन रहा ..18th अक्टूबर .. 14 साल पहले इसी दिन उस गेट के अंदर एंट्री ली जिसने न केवल प्रोफेशनल जिंदगी के बीज बोये परन्तु व्यक्तिगत जिंदगी के आसमाँ के विस्तार को बढ़ा दिया ..
कंप्यूटर लैब में सहपाठी ने यहीं ये सीखाया की "भाई अगर कहीं पर भी फँस जाओ तो "Escape" बटन दबा दो :)" , यहीं ये भी आभास हुआ की कुछ हो जाए मगर सन्डे ...का ब्रेकफास्ट मिस नहीं करना वरना मेस में इकलौते खाने लायक भोजन अर्थात आलू के परांठे सीधे अगले हफ्ते मिलेंगे .. दोस्त के बीमार पढ़ने पर उसके लिये मेस से खाना ले जाने का अघोषित नियम आपको और कहीं नहीं सिखाया जा सकता ..उस हॉस्टल में माँ-बाप भाई (बहन नहीं बोल सकता ;)) सबकुछ तो ये कमीने दोस्त ही होते थे .. सुबह के 3 बजे उठकर बमुश्किल खाली मिली टेबल पर टीटी सीखना हो या कालेज की बाउंड्री लाँद कर बाहर के ढाबे पर डिनर करना .. एक दोस्त का दूसरे दोस्त को सेमेस्टर एग्जाम से पहली रात को ये पूछना की " यार सेलेबस बता दे क्या-2 पढ़ूँ ताकि पास हो जाऊँ " ये भी इस कालेज की सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था .. वैसे शुरुवाती दिनों में सबसे अच्छी बॉन्डिंग होने के पीछे अगर किसी चीज का सबसे अहम् रोल था तो वो था शुद्ध (अ) शाकाहारी जोक्स ..देहरादून से लेकर दिल्ली ,मुरादाबाद से लेकर खटीमा ,रानीखेत से लेकर हल्द्वानी ,और हरिद्वार से लेकर टिहरी हर शहर के शुद्ध जोक्स वरना आपस में कैसे मिल पाते अकल्पनीय है ;) ..


मुहब्बत की बारीकियां हो या लगातार 3 दिनों तक चलता कानफोडू स्वर में बजता गीत " हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी " , ग़ज़लों के लिरिक्स का ज्ञानपूर्ण एनालिसिस हो या फिर ऑडिटोरियम में परदे पर चल रहे 2003 वर्ल्ड कप के मैच में शोएब और वकार पर थर्ड मैन की ओर सचिन और वीरू द्वारा लगाए छक्के और उसके बाद कुर्सियों पर चढ़कर किया गया पागल नृत्य .. कितनी सारी विधाओं में आपको कालेज पारंगत कर देता है .. कुछ मित्र कालेज में ही करवा चौथ का व्रत लेना और गर्ल्स हॉस्टल के सामने अपने प्रियतम को पानी पीलाने की विधा भी सीख गए और कुछ तो अबब एस्पेक्टशन की हर वर्ष नया प्रियतम ;) ..
साले सारे खुद को हीरो समझने वाले लौंडे ( ;) ) आख़िरी दिन ऐसे गलाफोड़ रोते हैं जैसे जीवन का अंत सामने हो .. वैसे लगता ये ही था .. खैर वक्त अपने पहिये को समान गति से आगे बढ़ाता चलता है .. प्रियतमों ने नये शौहर पा लिए ,दोस्तों में कुछ ही हैं जो आपके आसमाँ के नीचे संग धूप सेकते मिलते हैं.. टीटी की टेबल देखे ज़माना हुआ और संडे के आलू के परांठे अब उतने कच्चे नहीं होते , गजलें कभी-2 अपनी बोलों से आपको उन टेबल लैम्पों के उजाले की याद दिला देती है..पर एक विश्वास जो हमेशा से था और रहेगा और शायद नए बच्चे ये जान लें की "कालेज और उसके ऊपर हास्टल में जीवन का वो हिस्सा पलता है जो हर किसी को जरूर मिलना ही चाहिए ..सौभाग्य ही होगा .. व्यक्ति विकास की सबसे अहम् सीढी है वो "

आज के ही दिन वो दौर 14 साल पहले शुरू हुआ था , ऐ खुदा एक बार कभी फॉलो ओन ही सही पर सेकंड इनिंग्स खेलना का मौक़ा तो दे डाल :). 

उस पगली लड़की के बिन जीना भी भारी लगता है...

## पापा भाई को एक मोबाइल दिला दो , उसके इतने सारे हॉस्टल वाले दोस्तों के नंबर हैं हमारे पास, पर एक को फोन करो तो बोलता है की वो तो बालीबाल खेल रहा है ,दूसरे को फोन करो तो बोलता है की वो तो मेस में है ,तीसरा बोलता है "मैं तो लाइब्रेरी में हूँ" बहुत दिक्कत होती है ..
~~ मेरे पास तो नहीं हैं इतने पैसे इस महीने ..तू ही क्यों नहीं दिला देती तेरा गुल्लक तो फूल रहता है ?? पापा ने छेडते हुए कहा ..और वो सचमुच तैयार हो गई
## मैं दिला दूंगी मगर आप लौटा दोगे ना अगले महीने ? 
~~ हाँ हाँ लौटा दूंगा भाई ,बेटी के पैसे मार के नरक जाना है मुझे ?
और इस तरह कॉलेज के थर्ड इयर में मेरा पहला मोबाईल आया .. मेरी बहन "कवि" के गुल्लक के पैसों से ..मुझे नहीं पता की वो पैसे पापा ने उसको लौटाए या नहीं ,या नरक जाकर ही पता चलेगा ;) ...
कुम्हार विश्वास जब कहते हैं न ..हाँ-2 वो "आप" वाले कुमार विश्वास ,
"की उस पगली लड़की के बिन जीना भी भारी लगता है, और उसी पगली लड़की के बिन मरना गद्दारी लगता है" वो बहनों के लिये ज्यादा सूट करता है ..लड़कों को ये ध्यान देना चाहिए की "मासुकाएं तो बदल जाती हैं अक्सर दशक दर दशक ..;)"
मैं क्लास सेवेंथ में था और वो सिक्स्थ में , आपस में घमासान वाली लड़ाइयों से थोड़ा ऊपर जाने लगे थे हम दोनों ,उससे पहले वरना हम दोनों कट्टर प्रतिद्वन्दि हुआ करते थे .. अब भाई-बहन ज्यादा समझ आने लगा था ..उस रिश्ते की मुहब्बत की खुशबू थोड़ा-2 जेहन में समाने लगी थी .. बाजार में भाई-बहिन का कोई पोस्टर देख वो मुहब्बत और ज्यादा चरम पर आ गयी .. अब पापा से कौन बोले .." चल दोनों बोलते हैं " उसी ने सज्जस्ट किया ..
~~ पापा वो भाई बहन वाला पोस्टर ले लो ना प्लीज..
पापा थोड़ा दंग ये पारम्परिक दुश्मन आज इक्कठे एक ही बात कह रहे हैं .. थोडा गंभीर चेहरा करके और शायद मन ही मन मुस्कुरा के वो बोले
## यार घर पे कहाँ अच्छा लगेगा ये, इससे अच्छा तो वो सुन्दर सीनरी ले लो ...
हमारा सारा प्यार वहीं का वहीं रह गया ;) .. कमाल का रिश्ता है भाई बहन का बॉय गॉड .. दोस्ती ,दुश्मनी , अपनापन ,मुहब्बत और थोडा कभी क़ोई मदरली और दुसरा फादरली .. राखी आ रही है ना तो जज्बात इस दिशा में बह रहे हैं ..
एक और बात याद आ गई दमाल की " ये बता ये फाइनल वाली है ना ? हर बार अलग लड़की का नाम बताता है तू ;) "

PS: उसकी ये इच्छा की उसके बारे में कुछ लिखूँ काफी पुरानी है तो ले खुश रह ..चल I love you बोल देता हूँ ..I Love You ..:)

पहला "बीयर" एग्जाम !!

पहला "बीयर" एग्जाम, अप्रैल 1998,
नेशनल इंटर कालेज(Examination Center)
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..यूपी बोर्ड की हाईस्कूल का आख़िरी पर्चा ,हिंदी तृतीय ..आज तक समझ आया नहीं की किताब का नाम "संस्कृत परिचायिका " और सबकुछ था भी संस्कृत भाषा में लेकिन पेपर का नाम "हिंदी तृतीय " ,क्यों ? खैर ..
अल्मोड़े से कहीं आगे के किसी गांव के स्कूल के प्राइवेट वाले बच्चे भी हमारे साथ ही एग्जाम दे रहे थे ..इनको "बच्चे" कहना सही नहीं होगा कोई मैथ्स में 5 साल और कोई मैथ्स व साइंस दोनों में 7-8 साल से लगातार फेल हुए बच्चे अर्थात अंकल थे वो लोग ..
खुशी इस बात की कि बोर्ड के एग्जाम खत्म हो गए और अच्छे भी हुए मगर ये क्या ढोल क्यों बज रहा है ? अहा सारे प्राइवेट वाले बच्चे नाच रहें हैं ,ढोल का इन्तजाम किया हुआ था उन लोगों ने ..ऐसा जश्न केवल पेपर खत्म होने का ,और नाचना तो किसी बरात के भंगड़े से कम न था ..
चूंकी हमारे भी थोड़े नए-2 पंखं निकलने लगे थे हाई स्कूल जो क्रॉस होने वाला था,तो सारे मित्रो का प्लान बना की हम भी जश्न मनाएंगे ..मगर कैसे ?? कुछ एक ज्ञानी और पूरूषार्थ से भरे दोस्तों की कृपा की पहली बार पता चला की "बीयर" कुछ होती है और "दारू से तो बिलकुल अलग ये समझो की स्ट्रांग कोल्ड ड्रिंक ;) " ..

सबसे साहसी दोस्त ने ठेके पर जाकर सबके कौन्ट्री किये हुए पैसों से एक बियर खरीदी और पुरे शहर से बाहर जाने का कलेक्टिव निर्णय लिया गया ताकि किसीके भी कोई भी पहचानने वाले के हाथों पकडे न जाय ..
शहर से दूर जंगल में उस बीयर की बोतल को सही सलामत पहुँचा पाने का जो अचीवमेंट हम 6-7 दोस्तों को महसूस हो रहा था वो हाई स्कूल के एक्जाम में मैथ्स में अबव 90% नंबर लाने से कहीं अधिक् था ...
अब ये भी पता चला की बीयर की बोतल खोलने के लिए एक क्रिकेट बल्लेबाज की ही तरह "ओपनर" की जरूरत पढ़ती है और ओपनर हमारे पास था नहीं.. कुछ रण-बाँकुरे किस्म के दोस्तों ने मुंह से बोतल खोलने का या फिर हाथ के कड़े से खोलने का साहस दिखाया मगर परास्त हुए ..तब इस कला का अनुभव कम था या अनुभव शुरू ही हो रहा था ;)

 .. फिर कोई ज्ञानी दोस्त जिसके हमेशा सबसे ज्यादा नंबर सामाजिक विज्ञान में आते थे उसने अपने उस समाजिक ज्ञान का सहारा दिया ..
"बोतल के ऊपरी हिस्से को पत्थर से ऐसे तोड़ो की ढक्कन सहित अलग हो जाए और बीयर न गिरने पाय " सारी निराशा ,उल्लास में फिर परिवर्तित हो गया ..हम सारे 6-7 दोस्तों के चेहरे दुबारा खिल उठे .. इतनी मारामारी के बाद आखिर बीयर का टेस्ट लिया जाएगा ..बोतल का ऊपरी हिस्सा तोड़ा गया लेकिन उस प्रक्रिया में बोतल में भी कांच के टुकड़े चले गए ..एक नया सवाल सामने आया की अगर अब इस बीयर को पीयेंगे तो मुंह में कांच के टुकड़े जा सकते हैं और ये रिस्क कोई न लेगा .. पुनः सामाजिक विज्ञान के ज्ञाता मित्र ने रेस्क्यू किया ..""यार जिसका सबसे "साफ़" रूमाल है उसको टूटी बोतल के मुहाने पर रखो वो बीयर को छान लेगा और कांच बोतल में ही रह जाएंगे " कुमार विश्वास के तर्ज पर ,सबकी बाछें फिर खिल गयी चाहे कोई जाने या न जाने की बांछे होती कहाँ है ..इतनी जद्दोजहद के उपरान्त ,इस तरह 2-2 घूँट बीयर पीने का शुभअवसर हमको प्राप्त हुआ ..वो गर्मी के मौसम का "सबसे साफ़ रूमाल " के लिए आजतक भी हम कर्तज्ञता महसूस करते हैं ;) ..आपकी है कोई स्टोरी पहले बीयर की (जो बिलकुल दारू नहीं होती ;) ? बताओ न फिर ;) ..

PS: सबने उस समय बोला जरूर था की वो गर्म हो चुकी बीयर बहुत स्वादिष्ट है मगर मन ही मन सबका मानना था की "साला इतना कड़वा पेय के लिए हमने इतनी मशक्कत करी ??:( ...

~~ साढे आठ मिनट और तुम~~

रियर मिरर में पिछली कार में बैठी नवयुवती को देख मेरे मुंह से अक्सर निकलता है "सुन्दरी " और बगल की सीट में बैठी तुम धीरे से मुस्कुराती सी कुछ झूठ-मूठ का गुस्सा प्रदर्शित करती...फिर हम दोनों एनालिसिस करते हैं गाड़ी को उस कार के नजदीक ले जाकर की वो नवयुवती असल में सुन्दर है या ये मिरर का झूठ था.. किशोर-दा अक्सर बैकग्राउंड स्कोर गा रहे होते हैं ""की जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए "" ..
सुबह नौ बजकर बीस मिनट से लेकर नौ बजकर साढे अठाईस मिनट की हम दोनों की ये जर्नी पुरे दिन का सबसे ब्यूटीफुल टाइम लगता है मुझे ..कार से उतरते वक़्त तुम्हारा बड़े लाड से कहना की " जल्दी बाजी में नहीं ध्यान से चलाना " और फिर वो कहना जो कोई और कभी नहीं कहता मुझसे ;) "गुड डे" ..

थोड़ी देर मैन रोड तक आते-2 मेरा "तुम्हारा मेरी होने के लिए" ऊपर वाले को धन्यवाद कहना और मंद-2 मुस्कुराना ,सुबह अपने आप उन साढ़े आठ मिनटों में जीवंत हो जाती है ..
             " 'बेब' नहीं तुम्हारी हालत देख के अब तुमको 'बेबे' ही मिल पाएगी " कल वाला तुम्हारा ये कथन जिसमें तुमने बड़े दिनों बाद "छक्का" मारा था , अच्छा था .. यद्यपि इससे मैं टोटली डिसअग्री करता हूँ ;)
तुम्हारे जन्मदिन के सहारे मैं कुछ लिख लेता हूँ आज ज्यादा नहीं बस इन्ना(ये इन्ना भी तुम्हारी ही देन है ) ही ..
Happy Bday Heroine Poonam Nigam Keep Rocking and keep being Awesome .. ;)

Love
Darsh ;)