दिसंबर महीने का इश्क ..

on Friday, December 11, 2015

कालेज के शुरुवाती दिन हों और वो अभी तक क्लास की सभी लड़कियों के व्यवहार , व्यक्तितत्व का असेसमेंट ही कर रहा हो और अचानक उसको वो शांत रहने वाली लड़की पसंद आने लगे और उससे भी ज्यादा की लैब में प्रॅक्टिकल्स के दौरान वो दोनों एक ही बैच का हिस्सा बन जायें ,उसका सौभाग्य ही मानो ..लैब में कभी वे साथ वेल्डिंग कर रहे होते ,कभी मोटर की स्पीड माप रहे होते और कभी उन प्रॅक्टिकल्स के दौरान ही डम्ब-शैरॉड के कॉम...्पिटिशन की तैयारी ..परिस्थितियां खुद रिश्तों के रूप व आकार का निर्माण करती हैं ..
हॉस्टल में जाकर परम मित्र के एडवांस कम्प्यूटर जिसमें 256 MB की रैम आयी है पर कभी वो दोस्तों के साथ "देवदास" मूवी देखता कभी "रहना है तेरे दिल में" तो कभी जगजीत की गजलों में "इश्क कीजे फिर समझिये ,जिंदगी क्या चीज है " सुनते हुए जीवन की सार्थकता को मुह्हब्बत के चश्मे से ढूंढने की कोशिश करता ..मुह्हब्बत की खूशबू आने लगती जब भी वो उससे मिलती .. लड़की 80% नंबर लाती और वो 62 % ..उसको ज्ञात था की इतने प्रतिशत जिंदगी की गाड़ी धकेलने को प्रयाप्त हैं ..ऐसे ही पास होते हुए कालेज के आख़िरी साल हो चला ..वो चाहता तो था इजहारे इश्क करना पर साले की नब्ज कमजोर पड़ जाती थी ..कोशिश की थी जरूर , पर तीनों बार हिम्मत के गुब्बारे की हवा निकल गयी ..
आख़िरी सेमेस्टर था उसका कमीना दोस्त ज्यादा जिगरी हो गया था ..हॉस्टल के उसी कमरे में उसका दोस्त बोलता "साले कोई रिग्रेट लेकर मत जाना कालेज से " दोनों दोस्तों की सोच साला कितनी ज्यादा मिलती थी ..हर बात पर ..256 MB रैम वाले कम्प्यूटर से चित्रा सिंह गा रही होती "दिल~ए~नादाँ तुझे हुआ क्या है ,आखिर इस दर्द की दवा क्या है "


अगले दिन वो लड़की को लाइब्रेरी बुलाता और इजहारे इश्क तो पता नहीं पर ये जरूर कह आता की तुम दोस्त से काफी बढ़कर हो..आई लाईक यू .. और बदले में मेरी तुमसे कोई एक्सपेक्टेशन नहीं है ..कालेज के वे आख़िरी 3 महीने दोस्ती से ज्यादा वाला इमोशन का प्ले ग्राउंड बन जाता ..कालेज के आख़िरी दिन से पहली रात तकरीबन 2 बजे लड़की का sms आता " आई विल मिस यू :( "

नौकरी ढूढ़ने की जद्दोजहद लड़के और लड़की दोनों को एक ही शहर में अपने-2 रिश्तेदार के यहाँ पटक देते ..शहर का विस्तार जितना बड़ा था लोगों की जिंदगी उतनी सिमटी ..उस शहर में रहते पर वो मिल नहीं पाते ..केवल फोन का आसरा होता ..रिलाइंस के sms पैक को दोनों निचोड़ लेते. तकरीबन एक दिन के 400 sms आदान-प्रदान करने में.. "आई मिस यू" से "आई लव यू" और "आई लव यू टू" तक का सफ़र शुरू होता ..मिलने को तड़पन होती पर लड़की जिन रिश्तेदार के वहां रहती वहां से बाहर निकलना और मिलने की हिम्मत करना बस की नहीं थी ..ऊपर से नौकरी की खोज की उधेड़बुन .. लड़की की नौकरी किसी बड़ी कंपनी में लग जाती लड़के की किसी फैक्टरी में ..मिलने के लिए 200 किमी दूर कालेज जाना तय किया जाता ..लड़की का परिवार भी उस शहर के पास ही रहता ..इश्क की कमजोरियां और मजबूतियाँ के दौरान ऐसे ही निर्णय होते हैं जिनमे पागलपन हो और जिनको क़ोई तीसरा निरर्थक समझे,पर इश्क तो इश्क है ,पागलपन न हो तो काहे का इश्क ..एक मुलाक़ात के लिए 200 किमी दूर जाना तय रहा..

कालेज से डिग्री लेने की कोई खुशी नहीं थी मगर वो 3 घंटों की खुशी थी जो उन्होंने कालेज के अंदर अल्हड से इश्क की छतरी के नीचे बिताये..कुछ कुछ धुंधले सपने देखे ..लड़के ने पहली तनख्वाह से खरीदी ब्लैक पैंट और लाइट पीच कलर हाल्फ शर्ट पहनी थी और लड़की ने उस ड्रेस की दो बार तारीफ़ की ..वो फूला नहीं समाता पर जाहिर भी न करता ..कालेज के इतने सारे पेड़ों पर उन दोनों को नए फूल खिलते से नजर आने लगे हैं ..पर चार साल में पहले तो ऐसे कोई फूल थे नहीं वहाँ ..शायद हवाओं में बहती खूशबू भी इन फूलों की हो ..नहीँ वो तो इश्क की हवाएँ हैं .. अलविदा बोला और ये डिसाईड हुआ की सुबह इकट्ठे एक ही बस में चलेंगे ..लड़का दोस्त के घर चला गया और लड़की अपने ..


अगली सुबह दोस्त भी 4 बजे उठा स्कूटर पर लड़के को बस अड्डे छोड़ा और गले मिल के कुछ बिना कहे काफी कुछ कह गया ..इश्क के रास्तों में बहनें और दोस्त ऐसे होते हैं जैसे टेस्ट मैच में लोअर आर्डर का बैट्समैन ,रन आपको ही बनाने होते हैं मगर उनको अपने विकेट बचाई रखनी होती है ..आपकी इश्क की सेंचुरी में उनका ज्यादा योगदान होता है..गंगाजी को छूं कर आयी सर्द सी हवा सुबह 4 बजे जैसे जिंदगी के अहसासों को परालौकिक सा करती महसूस कर रहा था वो .. बस में दो टिकिट लेता और कंडक्टर को बोलता की एक सवारी अगले शहर से बैठेगी ..लड़की वहाँ इस टेंशन में है की कैसे उसी बस को पकडे ..साथ में छोड़ने आये गुस्सैल पापा भी हैं ..बस स्टॉप पर बस रुकी कंडक्टर चिल्लाया बुलाओ जी अपनी सवारी ..वो खामोश है ..आज भी वही हाफ शर्ट पहन आया जानबूझकर ..हाँ लाईट पीच कलर की ..लडकी के पापा की कंडक्टर से कुछ तो लड़ाई हो गयी है ..वो चुपचाप बैठा है "प्रेम के ईश्वर " से प्रार्थना करता ..प्लीज उसके पापा के गुस्से को शांत करवा दो और लड़की को बस में आने दो..बस छूटने ना पाय ..आखिरकार वो आयी ..दोनों की नजरें मिली मगर बोले नहीं अनजान बने रहे पापा भी आये थे न सामान चढाने ..पापा चले गए ..कंडक्टर चिल्लाया ..आपकी सवारी नहीं आयी ..लड़का बस इतना बोला की "चलो " .. लड़की आकार अब उसके बगल वाली सीट पर बैठ गयी है ..दोनों ने गहरी सांस ली ..थोड़ी बहुत बातें हुई ..अचानक से जीवन इतना रंगीन सा होने लगी ..सर्दियों में बर्फ पडने के दो-एक दिन बाद की धूप सी ..रातों को चमेली के पेड़ के नीचे की खुशबू सी ..बरसात के दिन के बाद रात को चमचमाते आसमाँ सी ..लड़की ने धीरे से पूछा की कोई दुसरी शर्ट नहीं लाये थे ..लड़का सिर हिलाते हुए झूठ बोलता "नहीं"

लड़की उसके कंधे पर सिर रखे भविष्य की अनिश्चितताओं का जिक्र करती और लड़का सर्दी की उस धूप समाँ गर्माहट को ज्यादा से ज्यादा ताप लेने की कोशिश .. दोनों को बिलकुल भी नहीं पता था की भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है पर दोनों को ये जरूर पता था की ये सफ़र ये समय अपने आप में सम्पूर्णता की छाप छोड़ेगा .. लड़का उन धुंधले सपनों में गुम खुद ही खुद में मुस्कुरा रहा है और लड़की धीरे से उसकी पीच कलर की हाफ शर्ट पर कहीं तो बाएं कंधे के पास चुपके से सेकण्ड के दसवें हिस्से से भी कम समय के लिए उसे चूम लेती है ..वो सोचती है की उसे खबर नहीं हुई और वो जानता है इस बात को ,इसलिए उस एक बटा दस सेकेण्ड के अहसास को महसूस होते हुए भी ऐसा व्यक्त करता है जैसे उसको पता नहीं चला ..ये बस का सफ़र और ये समय इस तरह कई पड़ाव पार करते एक दिन थम जाता है ..

दिसंबर महीने की भी अपनी कोई अलौकिक खुशबू होती है ..

इरा ...

कुछ अजनबी आपको जीवन के कई गुर देकर जाने कहाँ ग़ुम हो जाते हैं .. जहाँ हम क्लाइंट के डेटा को सिक्योर करने की बात कर रहे होते अचनाक वो बोला " दर्शन माय फ्रेंड ,किड्स आर द मोस्ट ब्यूटीफुल पार्ट ऑफ़ ए मैरिज " , उसके घर "सरस्वती ने जन्म लिया है .. लक्ष्मी कहना थोडा खटकता है मुझे ..बच्चे के जन्म से ही धन-धान्य का प्रतीक बनाना खटकता सा है ..वैसे भी हॉस्टल पहुँचने के बाद जब पापा जी ने पूछा की कल वापस जाते व...क्त एक बार फिर आऊंगा तो कुछ और सामान लाना तो नहीं है ...??
हाँ ले आईयेगा "एक छोटी सीे माँ सरस्वती का फ़ोटो फ्रेम और एक लोहे का संदूक " .. माँ सरस्वती तब से अपने लिए इक कोना उसके बाद से मेरे हर घर में ढूंढ़ के विराजमान हो हीं जाती हैं ..मैं कहना चाह रहा था की सरस्वती जी के लिए मैं थोड़ा बायस्ड हूँ ..

सच है बच्चे शादी का सबसे सुन्दर हिस्सा हैं बल्कि जीवन का भी.. कई सालों के निरर्थक विचारों का एन्ड-प्रोडक्ट ये निकला की जीवन के शायद ये तीन मूल उद्देश्य हैं ..

i. क्वालिटी सर्वाइवल ( जीवन शैली-सिर्फ भौतिक मापदंडों से मतलब नहीं ) 
ii. री-प्रोडक्टिविटी ( प्रकृति को ऋण वापसी ;))
iii. ब्रह्म प्राप्ति ( वो क्या कहते हैं हां ,आत्मा से परमात्मा का मिलन )

अब प्रभु तो कैसे मिलेंगे इसका प्रयास परस्पर जारी है और अनिश्चित है , बाकी दो टिक लगते नजर आ रहें हैं यहाँ .. जी हाँ सही समझे , शादी का सबसे सुन्दर हिस्सा यानि बच्चे और एक ऐसे ही ईश्वरीय देन का जन्म हुआ है मेरे यहाँ .. अभी खुशी और नई जिम्मेवारी की द्वीतरफा ढोलकी बजा रहा हूँ मैं .. ईश्वर के बाद अगर किसी को सबसे ज्यादा धन्यवाद मैं कहना चाहता हूँ तो वो है मेरी आत्मीय दोस्त ,हमसफ़र और पत्नी Poonam ..
 
जितनी सिंसरिटी और आत्मीयता से तुमने पिछले 8-9 महीनों में खुद का और इस नये जीवन का ख्याल रखा है उससे मेरा सभी "माँओं " के लिए कर्तज्ञता व सम्मान कई गुना बढ़ गया है ...
मौक़ा दार्शनिक होने का कपितु नहीँ है पर विचारों को जिन्न की तरह बोतल में समेट कर रखना नामुमकिन है  :)...

"मेघालय" में "गारो" कम्युनिटी अचानक से सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी लगने लगे हैं मुझे.. इस कम्युनिटी में "माँ" परिवार की मुखिया होती है ..और पुरुष-प्रधान समाज के एकदम उलट जीवन शैली .. बरसों पुराने लोहे के संदूक के एक कोने पर छिपा के रखा हुआ यक्ष-प्रश्न है ये .. "पुरुषों को क्यों और किसने परिवार का मुखिया या फिर डिसीजन-मेकर का ओहदा दिया होगा ?? ओबएश्ली पुरुषों ने खुद ही दिया होगा ..
माँ न केवल 9 महीने तक अपने गर्भ में बच्चे को बाहरी दुनिया की चिलचिलाती धूप समान यथार्थ के ताप से छाया प्रदान करती है वरन उस बच्चे के बडे होने तक हर पल उसका दुखहर्ता-सुखकर्ता बनके "जगदीश हरे" बनी रहती है .. पुरूषों से कोई शत्रुता नहीं है मेरी,पर पारिवारिक जिम्मेदारी का जितना लोड महिला उठाती है पुरुष उस अनुपात में कहीं कम .. और जब दोनों पति-पत्नीे प्रोफेशनल हैं तो समान आर्थिक जिम्मेदारी भी महिला निभातीे है तो ये और भी आवश्यक सा लगता है की क्यों ना "गारो जनजाति" सा महिला प्रधान समाज का शुभारम्भ किया जाय :)..फेमिनिस्ट नहीं बोलिए जस्ट निजी विचार ..खैर इस विषय पर फिर कभी .. अभी तो सिर्फ इतना " मेरे घर आयी एक नन्ही परी "

शुक्रिया खुदा और पूनम :)

( .."अब ये मत समझना की इस मुश्किल क्षण में मैं ये सब लिख रहा हों कुछ दिन पहले ही तैयारी कर ली थी" ..

18th अक्टूबर ..

कुछ तो स्पेशल है इस डेट में .. 18th अक्टूबर ..अगर आपको पूछा जाय की जिंदगी का एक दिन बताओ जो सबसे बड़ा माईल स्टोन हो तो हमारे लिए तो यही दिन रहा ..18th अक्टूबर .. 14 साल पहले इसी दिन उस गेट के अंदर एंट्री ली जिसने न केवल प्रोफेशनल जिंदगी के बीज बोये परन्तु व्यक्तिगत जिंदगी के आसमाँ के विस्तार को बढ़ा दिया ..
कंप्यूटर लैब में सहपाठी ने यहीं ये सीखाया की "भाई अगर कहीं पर भी फँस जाओ तो "Escape" बटन दबा दो :)" , यहीं ये भी आभास हुआ की कुछ हो जाए मगर सन्डे ...का ब्रेकफास्ट मिस नहीं करना वरना मेस में इकलौते खाने लायक भोजन अर्थात आलू के परांठे सीधे अगले हफ्ते मिलेंगे .. दोस्त के बीमार पढ़ने पर उसके लिये मेस से खाना ले जाने का अघोषित नियम आपको और कहीं नहीं सिखाया जा सकता ..उस हॉस्टल में माँ-बाप भाई (बहन नहीं बोल सकता ;)) सबकुछ तो ये कमीने दोस्त ही होते थे .. सुबह के 3 बजे उठकर बमुश्किल खाली मिली टेबल पर टीटी सीखना हो या कालेज की बाउंड्री लाँद कर बाहर के ढाबे पर डिनर करना .. एक दोस्त का दूसरे दोस्त को सेमेस्टर एग्जाम से पहली रात को ये पूछना की " यार सेलेबस बता दे क्या-2 पढ़ूँ ताकि पास हो जाऊँ " ये भी इस कालेज की सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था .. वैसे शुरुवाती दिनों में सबसे अच्छी बॉन्डिंग होने के पीछे अगर किसी चीज का सबसे अहम् रोल था तो वो था शुद्ध (अ) शाकाहारी जोक्स ..देहरादून से लेकर दिल्ली ,मुरादाबाद से लेकर खटीमा ,रानीखेत से लेकर हल्द्वानी ,और हरिद्वार से लेकर टिहरी हर शहर के शुद्ध जोक्स वरना आपस में कैसे मिल पाते अकल्पनीय है ;) ..


मुहब्बत की बारीकियां हो या लगातार 3 दिनों तक चलता कानफोडू स्वर में बजता गीत " हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी " , ग़ज़लों के लिरिक्स का ज्ञानपूर्ण एनालिसिस हो या फिर ऑडिटोरियम में परदे पर चल रहे 2003 वर्ल्ड कप के मैच में शोएब और वकार पर थर्ड मैन की ओर सचिन और वीरू द्वारा लगाए छक्के और उसके बाद कुर्सियों पर चढ़कर किया गया पागल नृत्य .. कितनी सारी विधाओं में आपको कालेज पारंगत कर देता है .. कुछ मित्र कालेज में ही करवा चौथ का व्रत लेना और गर्ल्स हॉस्टल के सामने अपने प्रियतम को पानी पीलाने की विधा भी सीख गए और कुछ तो अबब एस्पेक्टशन की हर वर्ष नया प्रियतम ;) ..
साले सारे खुद को हीरो समझने वाले लौंडे ( ;) ) आख़िरी दिन ऐसे गलाफोड़ रोते हैं जैसे जीवन का अंत सामने हो .. वैसे लगता ये ही था .. खैर वक्त अपने पहिये को समान गति से आगे बढ़ाता चलता है .. प्रियतमों ने नये शौहर पा लिए ,दोस्तों में कुछ ही हैं जो आपके आसमाँ के नीचे संग धूप सेकते मिलते हैं.. टीटी की टेबल देखे ज़माना हुआ और संडे के आलू के परांठे अब उतने कच्चे नहीं होते , गजलें कभी-2 अपनी बोलों से आपको उन टेबल लैम्पों के उजाले की याद दिला देती है..पर एक विश्वास जो हमेशा से था और रहेगा और शायद नए बच्चे ये जान लें की "कालेज और उसके ऊपर हास्टल में जीवन का वो हिस्सा पलता है जो हर किसी को जरूर मिलना ही चाहिए ..सौभाग्य ही होगा .. व्यक्ति विकास की सबसे अहम् सीढी है वो "

आज के ही दिन वो दौर 14 साल पहले शुरू हुआ था , ऐ खुदा एक बार कभी फॉलो ओन ही सही पर सेकंड इनिंग्स खेलना का मौक़ा तो दे डाल :). 

उस पगली लड़की के बिन जीना भी भारी लगता है...

## पापा भाई को एक मोबाइल दिला दो , उसके इतने सारे हॉस्टल वाले दोस्तों के नंबर हैं हमारे पास, पर एक को फोन करो तो बोलता है की वो तो बालीबाल खेल रहा है ,दूसरे को फोन करो तो बोलता है की वो तो मेस में है ,तीसरा बोलता है "मैं तो लाइब्रेरी में हूँ" बहुत दिक्कत होती है ..
~~ मेरे पास तो नहीं हैं इतने पैसे इस महीने ..तू ही क्यों नहीं दिला देती तेरा गुल्लक तो फूल रहता है ?? पापा ने छेडते हुए कहा ..और वो सचमुच तैयार हो गई
## मैं दिला दूंगी मगर आप लौटा दोगे ना अगले महीने ? 
~~ हाँ हाँ लौटा दूंगा भाई ,बेटी के पैसे मार के नरक जाना है मुझे ?
और इस तरह कॉलेज के थर्ड इयर में मेरा पहला मोबाईल आया .. मेरी बहन "कवि" के गुल्लक के पैसों से ..मुझे नहीं पता की वो पैसे पापा ने उसको लौटाए या नहीं ,या नरक जाकर ही पता चलेगा ;) ...
कुम्हार विश्वास जब कहते हैं न ..हाँ-2 वो "आप" वाले कुमार विश्वास ,
"की उस पगली लड़की के बिन जीना भी भारी लगता है, और उसी पगली लड़की के बिन मरना गद्दारी लगता है" वो बहनों के लिये ज्यादा सूट करता है ..लड़कों को ये ध्यान देना चाहिए की "मासुकाएं तो बदल जाती हैं अक्सर दशक दर दशक ..;)"
मैं क्लास सेवेंथ में था और वो सिक्स्थ में , आपस में घमासान वाली लड़ाइयों से थोड़ा ऊपर जाने लगे थे हम दोनों ,उससे पहले वरना हम दोनों कट्टर प्रतिद्वन्दि हुआ करते थे .. अब भाई-बहन ज्यादा समझ आने लगा था ..उस रिश्ते की मुहब्बत की खुशबू थोड़ा-2 जेहन में समाने लगी थी .. बाजार में भाई-बहिन का कोई पोस्टर देख वो मुहब्बत और ज्यादा चरम पर आ गयी .. अब पापा से कौन बोले .." चल दोनों बोलते हैं " उसी ने सज्जस्ट किया ..
~~ पापा वो भाई बहन वाला पोस्टर ले लो ना प्लीज..
पापा थोड़ा दंग ये पारम्परिक दुश्मन आज इक्कठे एक ही बात कह रहे हैं .. थोडा गंभीर चेहरा करके और शायद मन ही मन मुस्कुरा के वो बोले
## यार घर पे कहाँ अच्छा लगेगा ये, इससे अच्छा तो वो सुन्दर सीनरी ले लो ...
हमारा सारा प्यार वहीं का वहीं रह गया ;) .. कमाल का रिश्ता है भाई बहन का बॉय गॉड .. दोस्ती ,दुश्मनी , अपनापन ,मुहब्बत और थोडा कभी क़ोई मदरली और दुसरा फादरली .. राखी आ रही है ना तो जज्बात इस दिशा में बह रहे हैं ..
एक और बात याद आ गई दमाल की " ये बता ये फाइनल वाली है ना ? हर बार अलग लड़की का नाम बताता है तू ;) "

PS: उसकी ये इच्छा की उसके बारे में कुछ लिखूँ काफी पुरानी है तो ले खुश रह ..चल I love you बोल देता हूँ ..I Love You ..:)

पहला "बीयर" एग्जाम !!

पहला "बीयर" एग्जाम, अप्रैल 1998,
नेशनल इंटर कालेज(Examination Center)
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..यूपी बोर्ड की हाईस्कूल का आख़िरी पर्चा ,हिंदी तृतीय ..आज तक समझ आया नहीं की किताब का नाम "संस्कृत परिचायिका " और सबकुछ था भी संस्कृत भाषा में लेकिन पेपर का नाम "हिंदी तृतीय " ,क्यों ? खैर ..
अल्मोड़े से कहीं आगे के किसी गांव के स्कूल के प्राइवेट वाले बच्चे भी हमारे साथ ही एग्जाम दे रहे थे ..इनको "बच्चे" कहना सही नहीं होगा कोई मैथ्स में 5 साल और कोई मैथ्स व साइंस दोनों में 7-8 साल से लगातार फेल हुए बच्चे अर्थात अंकल थे वो लोग ..
खुशी इस बात की कि बोर्ड के एग्जाम खत्म हो गए और अच्छे भी हुए मगर ये क्या ढोल क्यों बज रहा है ? अहा सारे प्राइवेट वाले बच्चे नाच रहें हैं ,ढोल का इन्तजाम किया हुआ था उन लोगों ने ..ऐसा जश्न केवल पेपर खत्म होने का ,और नाचना तो किसी बरात के भंगड़े से कम न था ..
चूंकी हमारे भी थोड़े नए-2 पंखं निकलने लगे थे हाई स्कूल जो क्रॉस होने वाला था,तो सारे मित्रो का प्लान बना की हम भी जश्न मनाएंगे ..मगर कैसे ?? कुछ एक ज्ञानी और पूरूषार्थ से भरे दोस्तों की कृपा की पहली बार पता चला की "बीयर" कुछ होती है और "दारू से तो बिलकुल अलग ये समझो की स्ट्रांग कोल्ड ड्रिंक ;) " ..

सबसे साहसी दोस्त ने ठेके पर जाकर सबके कौन्ट्री किये हुए पैसों से एक बियर खरीदी और पुरे शहर से बाहर जाने का कलेक्टिव निर्णय लिया गया ताकि किसीके भी कोई भी पहचानने वाले के हाथों पकडे न जाय ..
शहर से दूर जंगल में उस बीयर की बोतल को सही सलामत पहुँचा पाने का जो अचीवमेंट हम 6-7 दोस्तों को महसूस हो रहा था वो हाई स्कूल के एक्जाम में मैथ्स में अबव 90% नंबर लाने से कहीं अधिक् था ...
अब ये भी पता चला की बीयर की बोतल खोलने के लिए एक क्रिकेट बल्लेबाज की ही तरह "ओपनर" की जरूरत पढ़ती है और ओपनर हमारे पास था नहीं.. कुछ रण-बाँकुरे किस्म के दोस्तों ने मुंह से बोतल खोलने का या फिर हाथ के कड़े से खोलने का साहस दिखाया मगर परास्त हुए ..तब इस कला का अनुभव कम था या अनुभव शुरू ही हो रहा था ;)

 .. फिर कोई ज्ञानी दोस्त जिसके हमेशा सबसे ज्यादा नंबर सामाजिक विज्ञान में आते थे उसने अपने उस समाजिक ज्ञान का सहारा दिया ..
"बोतल के ऊपरी हिस्से को पत्थर से ऐसे तोड़ो की ढक्कन सहित अलग हो जाए और बीयर न गिरने पाय " सारी निराशा ,उल्लास में फिर परिवर्तित हो गया ..हम सारे 6-7 दोस्तों के चेहरे दुबारा खिल उठे .. इतनी मारामारी के बाद आखिर बीयर का टेस्ट लिया जाएगा ..बोतल का ऊपरी हिस्सा तोड़ा गया लेकिन उस प्रक्रिया में बोतल में भी कांच के टुकड़े चले गए ..एक नया सवाल सामने आया की अगर अब इस बीयर को पीयेंगे तो मुंह में कांच के टुकड़े जा सकते हैं और ये रिस्क कोई न लेगा .. पुनः सामाजिक विज्ञान के ज्ञाता मित्र ने रेस्क्यू किया ..""यार जिसका सबसे "साफ़" रूमाल है उसको टूटी बोतल के मुहाने पर रखो वो बीयर को छान लेगा और कांच बोतल में ही रह जाएंगे " कुमार विश्वास के तर्ज पर ,सबकी बाछें फिर खिल गयी चाहे कोई जाने या न जाने की बांछे होती कहाँ है ..इतनी जद्दोजहद के उपरान्त ,इस तरह 2-2 घूँट बीयर पीने का शुभअवसर हमको प्राप्त हुआ ..वो गर्मी के मौसम का "सबसे साफ़ रूमाल " के लिए आजतक भी हम कर्तज्ञता महसूस करते हैं ;) ..आपकी है कोई स्टोरी पहले बीयर की (जो बिलकुल दारू नहीं होती ;) ? बताओ न फिर ;) ..

PS: सबने उस समय बोला जरूर था की वो गर्म हो चुकी बीयर बहुत स्वादिष्ट है मगर मन ही मन सबका मानना था की "साला इतना कड़वा पेय के लिए हमने इतनी मशक्कत करी ??:( ...

~~ साढे आठ मिनट और तुम~~

रियर मिरर में पिछली कार में बैठी नवयुवती को देख मेरे मुंह से अक्सर निकलता है "सुन्दरी " और बगल की सीट में बैठी तुम धीरे से मुस्कुराती सी कुछ झूठ-मूठ का गुस्सा प्रदर्शित करती...फिर हम दोनों एनालिसिस करते हैं गाड़ी को उस कार के नजदीक ले जाकर की वो नवयुवती असल में सुन्दर है या ये मिरर का झूठ था.. किशोर-दा अक्सर बैकग्राउंड स्कोर गा रहे होते हैं ""की जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए "" ..
सुबह नौ बजकर बीस मिनट से लेकर नौ बजकर साढे अठाईस मिनट की हम दोनों की ये जर्नी पुरे दिन का सबसे ब्यूटीफुल टाइम लगता है मुझे ..कार से उतरते वक़्त तुम्हारा बड़े लाड से कहना की " जल्दी बाजी में नहीं ध्यान से चलाना " और फिर वो कहना जो कोई और कभी नहीं कहता मुझसे ;) "गुड डे" ..

थोड़ी देर मैन रोड तक आते-2 मेरा "तुम्हारा मेरी होने के लिए" ऊपर वाले को धन्यवाद कहना और मंद-2 मुस्कुराना ,सुबह अपने आप उन साढ़े आठ मिनटों में जीवंत हो जाती है ..
             " 'बेब' नहीं तुम्हारी हालत देख के अब तुमको 'बेबे' ही मिल पाएगी " कल वाला तुम्हारा ये कथन जिसमें तुमने बड़े दिनों बाद "छक्का" मारा था , अच्छा था .. यद्यपि इससे मैं टोटली डिसअग्री करता हूँ ;)
तुम्हारे जन्मदिन के सहारे मैं कुछ लिख लेता हूँ आज ज्यादा नहीं बस इन्ना(ये इन्ना भी तुम्हारी ही देन है ) ही ..
Happy Bday Heroine Poonam Nigam Keep Rocking and keep being Awesome .. ;)

Love
Darsh ;)

मुट्ठी में जहान...

on Sunday, September 27, 2015
- सर हम इंग्लिश नहीं पढ़ना चाहते ..
 ~ हैं...ऐसा क्यों भाई ?
- सर इतनी मुश्किल से हम लोग ABCD सीखे और अब आप कहते हो की कैपिटल ABCD तो ठीक है मगर अब स्मॉल abcd सीखना है वो ज्यादा जरूरी है टेस्ट के लिए ..
~ बेटा सबकुछ तो स्मॉल abcd में लिखा होता है तो वो तो सीखना पढ़ेगा वरना एडमिशन होना नामुमकिन है
- सर हिंदी में  तो ऐसा कुछ नहीं होता कैपिटल और स्मॉल " क ख ग घ " फिर इंग्लिश में ऐसा क्यों ..
बाकी चार बच्चे भी उसके साथ हाँ में हाँ भर रहे थे ..
~ तुमको पता है इसका जवाब ,मैं बोला ..
 मैं मुस्कुराया और वो भी मुस्कुराई और बोली..
- अब आप कहोगे की अंग्रेज पागल हैं ..
         जब भी ऐसा क़ोई फंसने वाला प्रश्न हमारे सामने आता जिसका लॉजिकल जवाब हमारे पास भी नहीं होता तो यही यूनिवर्सल जवाब इजात किया था हमने .. सपोज बच्चे पूछें की now और know और no क्या फर्क बोलने में  ..तो पहले समझाया की k साइलेंट है ..क्या समझना था उन्होंने अगला सवाल तपाक से आएगा
- तो सर साइलेंट है तो फिर आगे लगाया ही क्यों 😢 ?
ऐसी कई परिस्थितियों से बचने का संजीवनी उपाय था..
~ बेटा ये मान लो की अंग्रेज पागल हैं ...

विंटर ऑफ़ 2008 , झुग्गी के 7x9 फ़ीट के उस कमरे में रात 9 से 11 बजे की क्लास का दृश्य ...शुरुवाती जर्नी के लिए  blog पढ़ें

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- हैलो सर , हाउ आर यू सर ?
फोन के उस तरफ से वो बोली
~ आई एम् फाइन ,हाउ आर यू मैडम ? मैं चिढ़ाने के लिए बोलता हूँ और हमेशा की तरह उसका तपाक से जवाब आता है
- डोंट कॉल मी मैडम ,वी आर योर स्टूडेंट सररर..
~ अच्छा अच्छा ठीक है ...
- हैप्पी बर्थडे सर ..हैप्पी टीचर्स डे सर , ऑल्सो हैप्पी जन्माष्ठमी सर  ..आपको पता है एक तारीख से रोज सुबह इतंजार कर रही थी की कब पांच तारीख आये और कब आपको विश करूँ ..
वो एक सांस में  बोलती है ये सब ..
~ अच्छा ?
- सर आपको एक बात बोलूँ ?
~ बोल ..
- सर हम कितने लक्की है फोर्चुनेट हैं ना की हमारे टीचर का बड्डे सारा देश मना रहा है 😊  ..
     वो जोर से खिलखिलाई और फिर से बोली
-  सर , या तो सर्वपल्ली राधाकृष्णन के स्टूडेंट्स लकी थे या फिर हम लकी हैं ..दोनों के टीचर्स का बड्डे टीचर्स डे के रूप में मना रहा है देश ;) 😊..
~ बेटा तू कुछ ज्यादा ही बड़ी हो गयी है ..मैं बोला और हँसने लगा ..
वो जोर जोर से फोन के उस तरफ से हंसती है और बोलेगी
- सर बहुत मजा आ रहा है आपसे बात करके ,बाकी दिन आप ऑफिस से बात करते हो तो धीरे-2 बात करते हो आज पुरे जोश में हो ..
- बेटा मेरा बड्डे है तो जोश में तो रहूंगा ही ना ऊपर से टीचर्स डे अलग ..मैंने भी अपने 3-4 टीचर्स को फोन करके उनको थैंक यू बोला तो और भी मजा आया ..
- सर यही तो आपके टीचर्स ने आपको आगे बढ़ाया और आप हमको बढ़ा रहे हो और फिर जब हम बढे हो जाएंगे तब हम किसी और की मदद करेंगे ..
~ हाँ तो यही तो मैं तुमको बचपन से कहता आया हूँ की ये चेन आगे बढ़ती रहनी चाहिए .. चेन रिएक्शन तू अगले साल 11th में पढ़ेगी ..अच्छा ये बता ये शादी और सगाई का क्या चक्कर है ..?
- सर बहुत दिनों तक रोज बहस होती रही घर पे फिर सब मुझे समझाने आते रहे की इतनी सारी बहनें हैं कैसे करेंगे सबकी शादी अगर तू नहीं मानी तो ..जब बहुत हो गया तो मेरी दो शर्तों पर वे भी मान गए और मैं भी ..
वो थोड़ा मुरझा सा गयी ये बोलते वक़्त ..
~ क्या शर्त ?
- सर एक तो की मैं शगाई कर लेती हूँ अभी, मगर शादी कम से कम बारहवीं पास करने के बाद तब तक मैं 18 साल की भी हों जाऊंगी..
~ और दुसरी ??
- दुसरी ये की मेरी पढ़ाई शादी के बाद भी जारी रहेगी ..
   मैं अचानक उस छोटी सी बच्ची की आवाज में गजब का संकल्प महसूस करता हूँ ..गजब की शक्ति और अद्भुत आत्मविश्वास .. ये वो ही बच्ची थी जिसको स्मॉल abcd नहीं पढ़ना था 7 साल पहले ...जिसको अगर Aid Noida ने मदद नहीं की होती तो बाकी बच्चों की तरह वो अनपढ़ रहती और प्रोबबली 2-3 साल पहली ही उसकी शादी भी हो चुकी होती .. मैं थोड़ा और टटोलने के बहाने पूछता हूँ
~ अगर उन्होंने पढाई रुकवा दी तो ?
- सर पढ़ाई तो मैं हर हाल में  करूंगी किसी ने मेरी पढाई रुकाने की कोशिश भी की ना चाहे वो अम्मी-अब्बा ही क्यों न हो " तब देखेंगे वो की मैं क्या कर सकती हूँ " फिर से वो दृढ़-संकल्प था उस आवाज में ..

         कमाल का को- इंसीडेंस है फोन के उस तरफ से नमाज से पहले की अजान( अल्लाह हो अकबर ..) की आवाज गूँज रही थी और जन्माष्ठमी की रैली वाले मेरी बाल्कनी के पास से गुजरते हुए "हरे रामा हरे कृष्णा " गाते हुए मृदंग के साथ सारे माहौल को गरजा रहे थे ..

#Letsprivilgedonehelptomakethelifeofthesekids 

" मेरे घर आना जिंदगी "

on Saturday, June 14, 2014
                      मैंने "श्रवण" को बोला कि एक और बीयर बनती है ,उसने मौन हामी भरी ,बीयर सर्व करते उस ऑस्ट्रेलियन युवा की तरफ मैने देखा ही था की वो बोल पड़ा " Do you need two mo ??"  मुझे कुछ शरारत सुझी "Hey man ,How did you know that ?? Even I have not said a single word " वो मुस्कुराया। .... मैं उसे फिर बोला " You know I am married " .. वो जोर से हंसते हुए बोला  … " Even I am not a gay " बीयर की ब्रांड का नाम था " Four Wives " अब वो शरारती लहजे में बोलता है की " Rather it should be "Two Wives" " .. हम तीनो ने जोर से ठहाका लगाया .... ​​

                               इसी सब में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए "श्रवण" बोला ,सरजी कई बार  तो लोग सुबह-२ खुद के पैसे मांगने आ जाते और पापा और हमारे पुरे परिवार को  खूब सारी  गालियां दे जाते थे  । कभी-२ हम लोग घर के बाहर ताला खुद ही लगवा देते थे  ।  करीब पिछले 12  सालों से उसके अंदर इतना "कष्ट " सहने ,उसको खुद में ही समेटने  और उससे लड़ने की इस  हिम्मत  का मैं तो कायल हो गया । वो मुझे "सरजी" कह कर ही पुकारता है जबकि वो मेरे ही स्कूल में मुझसे केवल  एक क्लास जुनियर था  बस । IT इंडस्ट्री की ही देन  है की हम दोनों ही आज सिडनी में स्कूल के बाद फिर मिले ! सरजी कभी-२ पुरे घर में खाने के लिए तक पैसे नहीं होते थे  । हमने कभी किसी का बुरा चाहा नहीं मगर  … 

                  सरजी, पापा का फाइनेंस का  बिजनेस था ,उनका  बिजनेस पार्टनर  इतनी बढी गबन करके फरार हो गया और हमको सड़क पर खड़ा कर दिया  … एक तो गरीब होता है जिसके पास कुछ भी नहीं होता मगर हमारे पास थे निगेटिव में 5 0-60   लाख  … किसी तरह से मेरे कॉलेज के लिए लोन सैंक्शन हुआ ।मैंने कालेज में ही सोच लिया था की अपनी  इंडिविजुअल  जिंदगी के बारे में तब सोचूंगा जब फैमिली के हालात ठीक  कर पाउँगा । मैंने ये सब आज तक किसी  को नहीं बताया  । हमेशा खुद को खुश रखने की  कोशिश करता रहा  । जब भी लो फील करता था पापा के बारे में सोच लेता था  । वो तो फ्रंट से ये लड़ाई लड़ते  रहे ,मैं तो सिपाही की तरह पीछे से सपोर्ट देता था बस  । आपको बताऊँ की  पापा को जेल तक जाना पड़ा  । "सरजी" पता नहीं क्यों आपसे "कनेक्ट" लगा मुझे वरना मेरे परिवार के अलावा ये सब मैंने किसी से शेयर नहीं किया आज तक  । मेरी मम्मी मुझसे बोलती रहती हैं की खुद के लिए भी कुछ कर लिया कर पिछले 7 -8  सालों में सिर्फ तुने हम सबके लिए किया है बस ! और मैं मम्मी को बोलता हूँ की "मैं सिर्फ एक जरिया हूँ ,करने वाला कहीं ऊपर बैठा है "  ।  "सरजी" मानवीय प्रयासों से ये सब हो पाना मुमकिन बिल्कुल नहीं था  ।  मैंने कभी किसी मैनेजर को नहीं बोला की मुझे onsite  भेजो ,कभी सोचा ही नहीं की ऐसा दिन आ पायेगा जब मेरा परिवार फिर खड़ा हो पायेगा   ।  "श्रवण" की आँखें चश्मे के पीछेे  नम थी  । 

                           
        मैं  बोला ईश्वर  सबकी मदद नहीं करता है शायद ,"You are a pure soul "  ,तुने  बिना संयम खोये ये लड़ाई लड़ी है बेस्वार्थ होकर ,इसीलिए ईश्वर तेरे साथ रहा हमेशा  । पर मेरा मन किया की उसको एक बार गले लगा लूँ फिर सोचा की जाते समय बोलूंगा  ।  फिर वो बोला पिछले 10 -12 सालों में अकेले मैं कितनी बार रोया हूँ याद तक नहीं है  ।  पिछले  साल मम्मी के गिरवी  गहने छुड़वाने वाले दिन मैं  कई घंटों तक रोता रहा  । मैं सोच में पड़ा रहा की मैंने ""श्रवण" को पिछले 10-12 सालों से जबसे मैं उसे जनता हूँ कभी दुखी नहीं देखा। । हमेशा हँसते हुए ,मुस्कुराते हुए  ,प्रयास के झुग्गी के बच्चों की फिकर करते हुए पाया   । जब भी हो पाता वो प्रयास के बच्चों के लिए डोनेट भी करता  … आज मुस्कुराते चेहरे के पीछे के दर्द को जाना ,संघर्ष को जाना तो "ईज्जत " कई सौ गुना बढ़  गयी मेरी नजरों में उसकी  । 
                           कह रहा था नवम्बर में कर्ज  का वो पहाड़ खत्म हो जाएगा ,फिर दोस्तों को बताऊंगा  । सरजी , मैं चाहता नहीं था की लोग मुझपे सिम्पैथी करें ,हमारी दोस्ती मेरे परिवार की हालात की वजह से बायज्ड हो  । फिल्मों में ऐसी कहानियां देखीं हैं काफी मगर ये तो असली "हीरो" बैठा था मेरे साथ  ।  मैं बहुत खुश था जो कुछ भी उसने हासिल किया था ,उसके लिए   जिस तरह से अडिग रहकर चुपचाप बिना किसी से शिकायत के वो संघर्ष किया है अतुलनीय है ये सब  । 

              मैं कुछ बोलता उससे पहले खुद ही बोला "सरजी " आपके  गले लगना चाहता हूँ एक बार    ।  वो अपने घर के लिए चला तो जा रहा था मगर मेरे स्मृतिपटल पर जितनी बड़ी छाप छोड़ के वो गया शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ हो  .... 

"और हम हैं की अभावों का रोना रोते हैं  ...." 

छू लूं आसमां ....

on Sunday, December 16, 2012

                                                                             जनवरी 2008 :(प्रयास नोएडा सेण्टर ) 

~ सरजी मैं बताऊ  ?
~ सोना तू रुक जा अभी बेटा ,सूबी ,सज्जाद ,जुलेखा ,साबरीन तुम सब बताओ
~ सर Q  फॉर क्वीन ... क्वीन मतलब रानी ..
सूबी ने जवाब दिया ...
~ सूबी  के अलावा किसी को नहीं पता क्या  ?? हद है एक ही बात  मैं कितनी बार पढ़ाऊंगा तुम सबको ??
~ सरजी अब तो मुझे बताने दो ना .. सोना बोली ..
सोना की नन्ही आँखों की चमक बता रही थी की उसे पता है ..
~ अच्छा बता सोना ? 
~ सर , Q फॉर क्वीन ,क्वीन मतलब रानी ,Q फॉर क्वील्ट ,क्वील्ट  मतलब रजाई .. और हाँ सरजी Q फॉर क्वेर्रल .. क्वेर्रल मतलब झगडना ....
~    कहाँ पढ़ा ये सब ???
~ सरजी आपने जो पाकिट डिक्शनरी दी थी .. उसी से पढ़ा ...

बता दूं की सोना नोयडा की झुग्गी के उन पांच बच्चों में से एक थी जिनको जनवरी से मार्च 2008 के उन तीन महीनों में  जीरो से क्लास 3 या अथवा क्लास 4 तक के लिऎ तैयार करने की जिम्मेवारी ली थी हमने .. ( विस्तार से पढने के लिए पढे "पितृत्व – एक यात्रा" ) ये बच्चे या तो  कूड़ा बीनते थे या कभी स्कूल नहीं  गए पहले ...कुछ गए भी तो सरकारी स्कूल में पत्थर चुनने में लगा दियी जाते थे ... 

मई  2011 : (प्रयास नोएडा सेण्टर ) 

~ सरजी ,आप बोलते थे ना की केवल अच्छे स्कूल में एडमिशन होने से कुछ नहीं होता ,जब तक की पांचवी पास न हो जाए सब बेकार है ...
~ हाँ तो ...
~ सरजी देखो अब मैंने पांचवी भी पास कर लिया और मेरा ओम फाउंडेशन में एडमिशन भी हो गया ..अब देखना मैं आपका नाम जरुर ऊँचा करूंगी ..
मन ही मन मैं खुश था ये सुनकर मगर एक अच्छे कोच की तरह अपने शिष्य को हमेशा धरातल पे रखने के एवज से बोला ..
~ देख सोना .. अच्छी बात है की तूझे एडमिशन मिल गया है .. पर असली पढाई तो अब है .. जब तक क्लास दसवी नहीं पास करती तब तक सब बेकार है ...
~ सरजी ..ये गलत बात है ..आप हर बार बढाते जाते हो ..दसवी पास जब हो जाउंगी तो बोलोगे ये बेकार है जब तक की बारहवी नहीं होती ... थोड़े उदासी व थोड़े गुस्से में बोली वो ..
~ बेटा ,जिन्दगी में हमारे लक्ष्य स्थिर नहीं होते ,समय के साथ वो भी बदलते हैं ...
कुछ ख़ास समझ नहीं आया उसे ,फिर भी वो शांत होकर बैठ गयी अपनी जगह पे ..

अगस्त 2012 :( बेगू सराय जिला बिहार )

~ क्या उम्र है तेरी ?
~ 14 साल ,पुलिस इन्स्पेक्टर की आँखों में आँखे डाल के बोली वो ..
झूठ बोलती है ये .. अठठारह बरस की है ये .. उसकी माँ बेगुसराय थाने के उस इन्स्पेक्टर को बोलने लगी ..
~ सर मम्मी झूठ बोलती है ताकि मेरी शादी रहमान भाईजान से करवां सके ...
~ चुप कर तू  ,चार अक्षर क्या पढ लिए चली बकवास करने ... 
~मोह्फीज ... तेरा ट्रेक रिकार्ड सब है मेरे थाने में .. कितने मर्डर के केस है तेरे खिलाफ सब जानता हूँ मैं ,इंस्पेक्टर बोला ...
~ साब लौण्डिया झूठ बोलती है .. मेरी भांजी है मुझे पता है अठठारह बरस की है य
~ लडकी को देख के पता चल रहा है की पंद्रह से ऊपर नहीं है ..और तुमने इसकी जबरदस्ती शादी करने की कोशिश की तो मैं "मोह्फीज  तुझे और तेरी   बहिन यानि इसकी  माँ दोनों को अन्दर  करूँगा लम्बे के लिए " ...
बताऊँ कि   हमारी एक  साहसी सहयोगी  की  गहरी कोशिश के तहत ( बेगू सराय के एसडीएम् , थानेदार से लेकर   डीएम तक फोन खड्कानॆ के बाद ही पुलिस पहुँची  थी सोना के गाँव ) ..

सितम्बर 2012 : ( इन्फोसिस चंडीगड़ )

~ हैलो , जी मैं दर्शन बोल रहा हूँ ,सोना से बात करवा दीजिये ..
~ अरे सर मैं सोना का मामा "मोह्फीज " बोल रहा हूँ ..आपका नाम सूना है ..
~ देखिये हम लोग पिछले 5-6 साल से बच्चों पर इसलिए मेहनत कर रहे थे ताकि एक दिन ये बच्चे अपने पैरों पर खडे हो सकें ..
~ सर आप फिकर न करिए ..हम सोना को यहीं बिहार में पढ़ाएंगे ... लीजिये सोना से बात करिए ..
~ कैसी है बेटा ... ?
~ सर मैं ठीक हूँ ,आप कैसे हैं ,सब लोग कैसे हैं प्रयास में ? 
~ सब ठीक हैं बेटा , कब आयेगी नोएडा ? 
~ सर मामा यहीं पढने का इतंजाम कर देंगे .... 

अक्टूबर 2012 : (प्रयास नोएडा सेण्टर ) 

~ तू तो फोन पर कह रही थी की तू वहीं पढेगी ?
~ सरजी मेरी गर्दन पर चक्कू रख दिया था ,तो मैं क्या कहती ?
~ तो तुझे मारा भी ??
~ सरजी मुझे खूब मारते थे ..मेरी पसलियाँ ऐसे आवाज करती हैं जैसे टूट गयीं हों .. बहुत दर्द रहता है सर .. और वो रोने लगी ...
~ फिर वापस कैसे आ गयी तू ?
~ पापा और मम्मी की लड़ाई हो गयी एक दिन और पापा मुझे और छोटी भाई को लेकर आ गए ...
~ पढेगी आगे या नहीं ??
~~ क्यों नहीं पढूंगी सर ..जरूर पढूंगी ..मगर स्कूल वाले दुबारा लेंगे मुझे या नहीं पता नहीं ..
~ हम करते हैं बात स्कूल में ...

नवम्बर 2012 : ( स्कूल )

 सोना के पापा को उसके भाई के स्कूल वालों ने दूबारा एडमिशन के लिए मना कर दिया था .. बोला की आप चार महीने बाद फिर गाँव चले जाओगे ..और फिर उसके चार महीने बाद लौटोगे ..हम कितनी बार एडमिशन करेंगे ...
उसके पापा भी केवल इसलिए स्कूल में बात करने गए क्योंकी हम उनको बार-2 समझा रहे थे ,हर किस्म की मदद कर रहे थे ... स्कूल वालों के बर्ताव से परेशान होकर उसके पापा ने ये शर्त रख दी की "सोना भी तब ही स्कूल जायेगी जब उसका भाई स्कूल जाएगा " ...
अगले दिन ...स्कूल प्रिंसिपल के आफिस में 

~ मैडम में आई  कम इन ??
~ यस कम इन प्लीज ...
~ मैडम मुझे अपने भाई के एडमिशन के लिये बात करनी है ..
~ बेटा आपके पापा को कल बता तो दिया था की "एडमिशन नहीं हो सकता "
~ मैडम ,एक बार मेरी बात सुन  लीजिये प्लीज ..
~ अच्छा बोलो ...
~ मैडम ,पापा  मुझे भी स्कूल नहीं जाने देंगे अगर भाई स्कूल नहीं गया तो .. 
~ बेटा तुम तो अच्छी स्टूडेंट थी मगर तुम्हारे भाई के लक्षण अच्छे नहीं हैं ..
~ मैडम लेकिन अगर आपने मेरे भाई को एडमिशन नहीं दिया तो ,पापा मुझे भी स्कूल नहीं जाने देंगे और मेरा "कैरियर " ख़त्म हो जाएगा ..मम्मी एक-दो साल मेरी शादी कर देगी ... मैडम प्लीज मेरी मदद कीजिये ना ,प्लीज ..
~ ठीक है अच्छा ,तुम्हारे भविष्य को संवारने की कोशिश के तहत तुम्हारे भाई को आख़िरी मौक़ा दे देते हैं ...
~ थैंक यूं सो मच मैडम ... 

ये वही स्कूल है जहां मार्च 2008 में सोना चार अन्य बच्चों के साथ अपने एडमिशन के लिए टेस्ट देने गयी थी ..हाल इतने खराब थे की सब लोगों की  रोनी हालत थी ... बहुत जिद के बाद स्कूल ने सोना और सूबी को क्लास थर्ड और बाकी तीन बच्चों को क्लास सेकंड में ले लिया .. और चार साल बाद आज सोना सेवेंथ क्लास में फिर से स्कूल जाने लगी है,इतना कुछ सहने के बावजूद उसके हौंसले बुलंद हैं ..और जिस लिहाज से उसने  प्रिसिपल मैडम को अपनी बात रखी वो सच में "परिवर्तन की बयार है , शिक्षा की बयार है ,और छोटी सी सोना के  बुलंद हौंसलों की बयार है "...
.....

PS: अगर आप सोना जैसी अन्य बच्चों की मदद करना चाहें तो  mail me:- darshanmehra@gmail.com...

तुम

on Monday, July 2, 2012
Skype conversation
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मैं : एक बात है जिसके  लिए  मैं स्योर हूँ  
तुम : क्या बे  ??
मैं : I think "तुम मुझे सबसे ज्यादा जानती हो "
तुम : हम्म हाँ शायद  ...  :) 
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मैं बता दूं कि हमारे रिश्ते के दरमियान अगर किसी ने सबसे ज्यादा साथ  दिया है तो वो है Internet ... शुरू से अब तक ..
Skype के सामने बैठे-२ एक दिन तुम्हें देख  कुछ लिखने को मन किया या शायद तुमने ही जिद की थी  ..
१० मिनट के बाद ये कविता बन के निकली थी ..
आज  तुम्हारा जन्मदिन  है ! और ये  "कविता"  तुम्हारे  जन्मदिन का गिफ्ट है, हाँ सही पढ़ा तुमने केवल ये "कविता" ही तुम्हारा गिफ्ट है  ...और हाँ अब मत कहना कि तुम्हारे लिए कुछ लिखा नहीं अब तक ...                               
                                    
     तुम                                 

कुछ  ख़ास  है वहाँ उस चेहरे पे 
कुछ  मधुर अहसास है वहां उस चेहरे पे
       कुछ प्रभा के संगीत सा ,वीणा की तान सा ..
       कुछ है जो खींच सा लेता है अपनी ओर
मिथ्या नहीं ,आकर्षण नहीं ,अँधेरे में दिये कि लौ सा ..
दिये की लौ, जो उज्जवल कर दे सारी कालिमा जीवन की ...


कुछ  ख़ास  है वहाँ उस चेहरे पे 
कुछ  मधुर अहसास है वहां उस चेहरे पे 
रक्तवेग बढ़ा देता  है ,उस चेहरे का एक  दीदार 
चेहरे पे मेरे मुस्कान व होंठों पर नमीं बिखेर देता है वो अहसास   ,
 शायद उन आखों की गहराइयों में भीगने की नमी  है ये ...
कुछ तो है ,कुछ तो ख़ास है उस चेहरे में 
इक अहसास ,अधपका सा अहसास 

एक तरुण वृक्ष सा लगता है ये चेहरा कभी ..
गर्म ,उष्ण रेगिस्तान की तपिश से ढ़ाकता तरुण वृक्ष
कभी एक उफान भी नजर आता है वहां
पहाडी नदी के बहाव सा ..   
कभी तरेंगे आती हैं
तालाब में पत्थर के बाद सा
                           
                         एक स्वप्न है ,एक आशा
                         प्रेयसी की परिभाषा है ..
                        उस लौ में ज्योत मुखर यूँ ही जगमगाती रहे 
                        दिवाली के ओज सा जीवन यूँ ही प्रकाशित करते रहे ..
                        छोटी सी यह "अभिलाषा"  है ....

कुछ तो "जरूर"  ख़ास है.. वहां उस चेहरे पे ...

PS :देखो कितना इत्तेफाक है कि आज "चाँद" भी  पूरा नजर आ रहा है :)