ज़ीवन प्रयोग ...

on Friday, March 13, 2009


मैंने सुना हुआ था कि जब इंसान की मृत्यु होती है तो उसका शरीर नीला पडने लगता है !यही सोचकर मैंने लेटे हुए ही अपने हाथों की तरफ देखा तो मेरी घबराहट काफी बढ गयी ! क्योंकि मुझे मेरे हाथ नीले नजर आ रहे थे ! पर बहुत ध्यान लगा कर सोचा तो समझ आया कि आज तो होली है तो हाथों में रंग लगा हुआ है शायद ! मगर फिर अपने शरीर को देखा तो समझ आ ही गया कि मौत करीब है शायद वरना शरीर भी नीला क्यों नजर आता ? यह कोई कहानी नहीं है मगर एक दुर्घटना का विवरण है !
10 मार्च यानि होली की पहली रात को मैं और अरूण, भाँग के इंतजामात के लिये रिक्शे वाले से लेकर, पान वाले से तक पूछ रहे थे कि सरकारी भाँग का ठेका कहाँ है ? क्योंकि रैम्बो ने अन्दर की खबर दी थी कि सेक्टर् 15 में भाँग मिलती है ! हम लोग कोशिश कर रहे थे कि हमारे चेहरे पे किसी भी किस्म कि सिकन न नजर आ जाये !मंद-मंद मुस्कुराहट हम दोनो कि चेहरों पर खिली हुई थी जैसे कि किसी रणभूमि फतह की तैयारी चल रही हो और हमको पता हो कि विजय क सेहरा हमारे ही माथे चढेगा !
हमको जब यह पता चला कि भाँग के भी सरकारी ठेके होते हैं तो मेरे दिमाग में तो यह खयाल आ रहा था कि हम कई दिनों से ढूँढ रहे थे मगर यह तो बहुत आसानी से हासिल हो गया ! यहाँ पर यह बताना बहुत जरूरी है कि हम लोग यानि डी-51 के योद्धा केवल एक बार इस भाँग पीने के प्रयोग से गुजरना चाहते थे वरना हम भँगेडी नहीं हैं :) ! आखिरकार हमको भाँग का ठेका तो मिल गया मगर पता नहीं था कि कितनी मात्रा में लेना चाहिये और कैसे ! एक अजीब सी झिझक थी दुकानदार से पूछने के लिये मगर थोडी देर सारे ग्राहकों को ध्यान से देखने के बाद हमको भी समझ आ गया कि हाथों कि मेंहन्दी के समान यह हरे से पत्तों का पिसा हुआ मसाला ही भाँग है जो कि 20-20 रू में एक ढेली मिल रही थी ! लोगों को देखने के और सोच विचार् के पश्चात हमने रू 50 की भाँग ली और खुशी से रैम्बो को फोन पे बताया ! हमेशा की तरह रैम्बो की असंतुष्ट आत्मा नही मानी और् उसके कहने पर हमने फिर से रू 50 की भाँग ले ली ! एक अंकल जी से पूछा कि भाँग कैसे खाते हैं तो उन्होने बहुत ही दयालु व सरल भाव से बताया कि मैं तो भाँग को ऐसे ही खा जाता हूँ और उसके पश्चात पानी पी लेता हूँ यह तरीका मुझे तो अच्छा नहीं लगा किसी भी तरह से उपर से हँसी और आ गयी इस बात पर :) !

घर पहुँचकर ठंडाई का इंतजाम करने के बाद हमारा भाँग-मोह बढता चला गया ! भाँग का भोग लगने की तैयारी बेहद दिलचस्प हो रही थी ! इतनी तैयारी डी-51 में या तो क्रिकेट मैच देखने के लिये होती है या फिर जन्मदिन का केक काटने के लिये ! दूसरी सुबह यानि होली वाले दिन हम लोग उठे भी नहीं थे अभी तक मगर देखा तो सेल्वा अपने टूटे (Fractured) हुए पैर के प्लास्टर पर पाँलीथीन बाँधकर होली खेलने के लिये पूरी तरह से तैयार था ,सेल्वा का ये जज्बा काबिले-तारीफ था , इंसाह-अल्लाह !! :) ! डी-51 की होली में हम 5 योद्धाओं (सेल्वा,अरूण रैम्बो,चौहान और मैं (दर्शन)) के अतिरिक्त हमेशा कुछ मेहमान जरूर शामिल होते हैं नीरज ,राज शोभित इस साल की होली के भागीदार थे ! हमेशा कि तरह पानी की निकासी बंद कर दी गई और शूरू हुआ गुलाल,रंग ,गुजिया,मस्ती ,और पानी का दौर ! जब यह दौर शुरू होता है तो मस्ती अपने उच्चतम शीर्ष पर होती है ,हमारे पानी वाले रंगों का स्टाक खत्म हो गया तो पून: केवल पानी वाले रंग के लिये शर्माजी की दुकान पहुँचे ! बहुत देर होली खेलने के बाद भाँग की याद आई :) ! मैंने और रैम्बो ने ठंडाई बनाने का कार्य शूरू किया ! करीब -2 पूरी भाँग डाल दी थी हमने ठंडाई में ! रात को अरूण अपने PDA पर Google पर भाँग पीने के तरीके खोज रहा था ! जो कि केवल एक निरर्थक प्रयत्न था !मगर हम सब लोगों को वाकई नहीं पता था कि कितनी मात्रा में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिये !! 5 ग्लास ठंडाई के जब आपस में टकराये तो बडी जोर से पाँच् आवाजें भी आई - Cheers !!भाँग पीने और उसके उपरांत होने वाले नशे की कल्पना मात्र काफी उत्साहजनक थी ! हम लोग पीने के बाद फिर से बाहर बैठ गये और जब 10-15 मिनट तक कुछ भी नहीं हुआ तो सबका एक ही कथन था वो ये कि कुछ भी नहीं होता भाँग पीकर नशा तो कुछ भी नहीं हुआ मगर इस दौरान मुझे झपकी सी आने लगी तो मह्सूस हुआ कि कुछ असर होने लगा है ! सभी लोग कालोनी के होली महोत्सव के स्थान पर पहुँचे मगर मैंने सबको मना कर दिया ! लेकिन बाद में राज के आग्रह पर मैं भी चला गया ! इस समय तक नशा बहुत अच्छा मह्सूस हो रहा था ! मैं बिना किसी वजह के मुस्कुरा रहा था ! एक बार जब मैंने चौहान और रैम्बो को देखा तो हँसी खुद ब खुद आ रही थी ! अपने आप से नियंत्रण खोते हुए जान कर मैं स्वयं वापस आ गया था और मेरे पीछे-2 सभी लोग वापस आ गये ! डी-51 में प्रवेश करने के पश्चात सबसे पहला काम यह किया कि घर को अन्दर से ताला मार दिया गया! राज और शोभित के जाने के बाद अजय और उसके दोस्त भी चले गये ! मैं एक तरफ तो हँस रहा था और एक तरफ यह बोल रहा था कि Yesssssss मुझे चढ गई finally !! :) अभी तक तो केवल मैंनें हँसना शूरू किया था पर देखते ही देखेते सब लोग हँसने लगे ! बहुत जोर-2 से हँसने लगेगी हम सब और हम पाँचो के बीच अकेला नीरज ! उन कुछ 4-5 मिनटों के लिये तो ऐसा लगा जैसे चाह्ते हुए भी हँसी नहीं रूक रही है और यह अवस्था बहुत ही खूबसूरत है ! यह सब देखकर मैं सबके सामने बोल ही पडा Mission Bhang accomplished !! “ !
यह सबकुछ जितना मनोरंजक लग रहा था अचानक से यह मनोरंजन खत्म होने लगा ! हृदय गति तेज होने लगी शरीर में जकडन शूरू होने लगी ! मुझे कहीं न कहीं ये अह्सास और डर था कि भाँग की मात्रा अधिक हो गयी थी और ये शरीर की जकडन और दिमाग का दर्द उसी का परिणाम था शायद ! मैंने सबसे पहले सबको आगाह किया कि दोस्तो ज्यादा मत हँसो क्योंकि जैसी हालत हम लोग मह्सूस कर रहे थे वह् पहले कभी भी मह्सूस नहीं हुई थी ! लग रहा था जैसे आज दिमाग फट जायेगा , ब्लड प्रेशर ( रक्तचाप) इतना तीव्र था कि मेरे कानों के पीछे एक अजीब सी आवाज सुनाई दे रही थी जैसे बहुत सारी मधुमक्खियाँ भन्ना रही हैं ! कुछ लोगों ने उल्टियाँ करनी शूरू की तो उस पल के लिये मुझे नीरज का ध्यान आया ! एक क्षण के लिये दिमाग को नियंत्रण करके मैंने नीरज को सब लोगों की ओर से माफी माँगी ! मगर इतना भयावह मैंने पूर्व में कभी भी मह्सूस नहीं किया था ! पाँचो चेहरे ऐसे डरे हुए थे जैसे मौत सामने खडी हो ! शरीर और मस्तिष्क का कहीं भी कोई संपर्क नहीं था ! शरीर को इतना कष्ट और दर्द सहते हुए पहले कभी भी नहीं पाया था :( !
किसी तरह से पानी के नल के नीचे पहले अपना सिर धोया फिर चौहान और रैम्बो का ! सेल्वा सो चुका था और अरुण किसी गहरी सोच में था ! मैं एक एक पल को जैसे गिन रहा था कि जल्दी खत्म हो जाये ये सब ! मैं पूरे दो घंटे बाथरूम से लेकर बाहर के कमरे तक घूमता रहा और केवल दो-तीन बातें ही सोचता रहा एक तो यह कि ऐसी बुरी मौत नहीं मरना चाहता था ! घर वाले बार-2 याद आ रहे थे कि अगर ऐसे मर गये तो घर वालों के लिये कितनी शर्म की बात होगी ! दूसरी जो सबसे मह्त्तव्पूर्ण बात याद आ रही थी वो ये कि हमें अपनी हदें पार नहीं करनी चाहिये ! हर चीज का प्रयोग करके ही हम सबक नहीं सीख सकते ! कभी-2 पहला प्रयोग ही भयानक और जानलेवा हो सकता है !
नीरज ने दो-तीन बार बोला कि भैया आप सो जाओ मगर जैसे ही सोने की कोशिश की तो पूरा शरीर नीला नजर आन लगा ! मुझे डर लगने लगा था कि अगर हम पाँचो में से किसी एक की भी मृत्यु हो गयी तो डी-51 का ये प्यारा संसार तो बर्बाद हो जायेगा ! आखिरी मुक्ति का साधन हमेशा कि तरह कुल-देवता की शरण नजर आने लगी तथा आखिरी प्रार्थना कि हे ईश्वर आज हम पाँचों को बचा ले और जीवन में कभी भी ऐसी राह नहीं चुनेंगे ! मेरे हृदय के उपर ऐसा मह्सूस हो रहा था जैसे कुछ आग का गोला जल रहा हो ! जब शरीर के लिये यह कष्ट असहनीय हो गया तो बीच में मैने अरूण और रैम्बो से यह तक पूछ डाला कि क्या हमें एम्बुलैंन्स बुलाना चाहिये ! मगर दोनों ने ही मना कर दिया ! चौहान ने तो माताजी और पिताजी को याद कर लिया था जैसे मृत्यु समीप आ चुकी होगी ! अरूण ओशो कि कोई किताब लेकर पढने की कोशिश कर रहा था मगर ऐसी हालत में पढ पाना सम्भव ही नहीं था सो उसने पढना भी छोड दिया ! एक बात सच है कि कभी भी ऐसा नहीं लगा कि हम लोग धरती पर हैं कहीं धरती और आसमान के बीच में जैसे जान अटकी पडी थी जैसे ! अरूण कह रहा था कि “this is a spiritual phase” .सच में घर के बाहर के वातावरण और अन्दर चल रहे गीत दोनों ही अलग-2 दुनिया के हिस्से लग रहे थे ! परंतु शरीर और मस्तिष्क का इतना विक्षित रूप कभी कल्पना भी नहीं की थी !
किसी तरह 5-6 घंटे में जब मुझे अपनी बाल्कनी से नीचे सडक पर खेलते बच्चों की आवाज सुनाई देने लगी उसके बाद ही मैं यह मह्सूस कर पाया कि शायद हम सब की जान बच गई ! भाँग पीने के अपने इस निर्णय पर बहुत ही शर्म व ग्लानि मह्सूस होने लगी थी ! अगर सच बोला जाय तो अपने जीवन के सबसे बडी गलती बोल सकता हूँ इस घटना को मैं ! भाँग का यह नशा हम सब पर कम से कम 24 घंटे हावी रहा ! एक बात जो कि अवश्यंभावी थी वो यह कि हम पाँचों तो जिन्दगी में ऐसा कभी फिर नहीं करेंगे !
इस लेख को लिखने का मक्सद भी केवल इतना था कि एक संदेश दे सकें कि अपनी हदों को खुद ब खुद पहचानना जरूरी है और ऐसा कोई भी प्रयोग ना करें जो आपको ग्लानि से भर दे या जो आपको उस प्रयोग का विवरण करने तक का मौका न दे ! और जीवन साधारण अवस्था में जितना खूबसूरत है उतना खूबसूरत कहीं नही !


Darshan Mehra



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AID-Delhi 5th Birth Anniversary

on Wednesday, January 28, 2009



छोटी सी कोशिश AID-Delhi के इस 5 साल के सफर को केवल कुछ पंक्तियों में उकेरने की !!

ठान ली है हमने की कुछ कर दिखायेंगे !

राह के पत्थरों को हम हिला देंगे !!


मुल्क के निर्माण के खातिर बढ चला ये कारवाँ !

AID-Delhi के सफर ने बाँध डाला ये शमा !!

हम बढेंगे , हम बनेंगे राष्ट्र परिवर्तन में भागीदार !

मील का पत्थर समझ लो आज का ये पडाव !!



ठान ली है हमने की कुछ कर दिखायेंगे !

राह के पत्थरों को हम हिला देंगे !!



Darshan Mehra
darshanmehra@gmail.com



D-51 ...

on Tuesday, November 18, 2008




समय
रात्रि के तकरीबन 1 बजे ,श्रीमान अमित कुमार जी लौटे ऋषिकेश यानि अपने गृह-शहर से ! अमित कुमार नाम से इनकी पहचान कम ही लोगों से है ! वरना ये संसार इनको “रैम्बो” नाम से ही पहचानता है ! मैं बाहर के कमरे में अर्धनिद्रा में सो ही रहा था कि रैम्बो बोला “ यार अब तो घर भी यहीं लगता है ” !


इस छोटे से वाक्य में काफी गहरा संदर्भ छुपा था ! यह कथन केवल रैम्बो के लिये ही सत्य नही था वरन हम चार अन्य दिग्गजों के लिये भी उतना ही सत्य था ! प्राय: किसी स्थान से लगाव होना वाजिब ही है जब वहाँ पर आप अपने जीवन का कोई भी हिस्सा व्यतीत करें ! लेकिन किसी घर का मतलब उस जगह से ना होकर इसमें रहने वाले लोगों से होता है ! इसीलिये हम घर उसे बोलते हैं जहाँ हमारा परिवार रह्ता है माँ,पिता भाई ,बहन आदि ! परंतु डी-51 एक ऐसा घर है जहाँ रिश्तों के नाम उपरोक्त रिश्तों में से कोई भी नहीं है लेकिन हम पाँच इसे घर ही कहते हैं !
           मैने ज्यादातर लोगों को यह कहते हुए सुना है कि हमारा बचपन जीवन का सबसे ज्यादा खूबसूरत दौर था ! जब खुशी और मस्ती का दामन थामे हुए हम सब अपनी सुन्दर सी, हसीन सी दुनिया में मदमस्त पंछी के समान विचरण किया करते थे ! परंतु मैं एक बात बहुत ठोस आधार पर कह सकता हूँ कि डी-51 के भीतर का जीवन उस हसीन बचपन से भी ज्यादा हसीन है ! अगर डी-51 के अन्दर वह बचपन की मस्ती है तो प्रौढ होने की स्वतंत्रता है ! यहाँ बचपन का अल्हडपन है तो एक-दूजे के लिये गहरे जज्बात हैं ! डी-51 की सर्वश्रेष्ट् बात बताना चाहूँ तो यह कि हम पाँचो किसी भी कार्य या आयोजन के लिये दूसरा विचार (second thought) नहीं देते ! यह एक दूसरे के लिये विश्वास है या हम पाँचों की जन्मजात प्रकृति !
चाहे रात के 2:30 बजे नोयडा की सडकों पर चाय का ठेला ढूँढना हो या आफिस से आने के पश्चात तरण-ताल(swimming pool) जाना हो ! कभी-कभी मुझे लगता है SPICE MALL में रात के 11:15 बजे की फिल्म शो का सबसे ज्यादा हकदार डी-51 ही है, कम से कम मैं तो मूवी-हाल सोने जाता हूँ 150 रू. की नींद :) !
जब से दो अन्ना :) (अरूण व सेल्वा) आये हैं तो हमारे इस घर में रही- सही कमी में पूर्णता आ गयी है ! छोटॆ अन्ना (सेल्वा :) ) ने हमें हर 15 दिन में केक काटना सीखा दिया ! चाहे वो मम्मी-पापा का जन्मदिन मनाना हो या orkut के एक अन्जान profile का जन्मदिन मनाना हो !
                जिन्दगी के साथ नये प्रयोगों के लिये डी-51 हमेशा तैयार है ,मेरे जन्मदिन पर राष्ट्रीय नाटय एकेड्मी में 2 घण्टे 20 मिनट का पकाऊ नाट्क देखना हो या बंगला साहिब के रात्रि-दर्शन ,आन्ध्रा भवन का दक्षिण भारतीय भोजन ,ये सब प्रयोगों का सिलसिला ही था ! नये साल पर पराठें वाली गली के पराठे-लस्सी कोई नही भूल सकता !
                   सही मायनों में डी-51 के सबसे मजबूत स्तम्भ चौहान और रैम्बो ही हैं ! सब्जी से लेकर राशन का अधिकतर इंतजाम ये दो भले मानुष ही करते हैं ! ज्यादातर मतलब की हम लोग भी करते हैं मगर ये दोनो जिम्मेदार मानुष हैं ! सच यह भी है कि ये दोनो के पास समय अनुपलब्धता भी कम होती है ! और डी-51 की कमजोर कडीयां अरूण और स्वयं मैं हूँ ! परंतु हम पाँच मिलाकर एक मजबूत नींव बनाते हैं !
                घरो में आज के व्यस्त दौर में वह पुरानी परम्परा कायम है या नही परंतु डी-51 के भीतर रात्रि-भोजन मिलकर ही होता है ! घर के मुखिया के समान चौहान इस आयोजन का प्रतिनिधित्व करता है ! सामान्यत: अगर कोई सदस्य रात्रि में देरी से पहुँचे तो रात्रि-भोजन 11:30 बजे देर तक भी किया जाता है !पार्वती माता की भागीदारी भी डी-51 की सफलता में महत्त्वपूर्ण है ! वह हमारे घर पर खाना ,बर्तन,झाडू करने आती है और उसके द्वारा बना हुआ भोजन वाकई स्वादिष्ट होता है ! कुछ और लोग डी-51 की सफलता का हिस्सा रहे हैं बल्कि आलोक तिवारी तो शुरूआती दिनों के आधार का मजबूत हिस्सा रहा ! बिष्ट की खामोशी डी-51 में ही टूट पायी :) !
                                 क्रिकेट का फितूर का आलम देखो की विश्व कप से पहले डी-51 के दो महापुरूष एक महीने के लिये टी.वी. ही किराये पर लाने चल पडे (जो कि बाद में हमने खरीद ही लिया) ! होली के दिन की ह्ल्दी ,डिटरजेंट और हरपिक की होली हो या नये साल के दिन के दिल के आकार के गुब्बारे हो या शिमला का family picnic हमेशा जिंदादिली और गहरे रिश्तों का मिसाल है डी-51 !

                         इस लेख को लिखने की प्रेरणा अरूण का वह सपना है जिसने डी-51 को आशंकित कर दिया है ! जिस सपने के अनुसार डी-51 केवल एक साल तक बाकि है और उसके पश्चात सब अपनी-अपनी राह !मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह एक साल कई सालों से बडा हो !
इस लेख की गरमजोशी या तो वह समझ सकता है जो डी-51 का हिस्सा रहा हो या फिर जिसने डी-51 में समय बिताया हो ! परंतु अगर आप इस कहानी का सारांश निकालना चाहें तो आप एक सीख जरूर ले सकते है डी-51 से !
भूतकाल गुजर चुका,भविष्य दूर है, इसलिये वर्तमान को भरपूर
जियो खुशी बिखेरते हुए और गम के साथ लडते हुए ! “

D-51 जिन्दाबाद !!!!!!


Darshan Mehra


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on Monday, September 15, 2008





मुझे लगता है कि प्रेम एक ऐसा विषय है जिस पर अनगिनत कवितायें लिखी गई है ! परंतु अगर सागर में एक बूंद बड भी जाय तो सागर के अस्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला !
इस कविता का उद्देश्य केवल एक विश्वास को कायम रख्नना था कि मैं कविता भी लिख सकता हूँ ! और यही विश्वास इस कविता के पीछे का वास्त्विक बल भी है !
मैं जानता हूँ कि कविता बहुत साधारण है परंतु बस यही कहुँगा कि अगर पुत्र बहुत सुदंर ना भी हो तो पिता का प्रेम कम नहीं होता !




             तुम प्रेम हो .... 

मन तू क्यों इतना विचलित है ?
इस धीर-अधीर के पथ पर तू क्यों इतना व्याकुल है ?
क्यों सन्नाटे की आहट भी हृदय को गूँज रही है ?
क्यों पसारता है अस्थिर मन, उडने को पंख गगन में ?

धमनियों में रक्त – ताप क्यों शीतल है इतना ?
क्यों सोच के सागर में सिर्फ उसकी ही परछाई है ?
क्यों उस चेहरे को सोच-सोच मुस्कुरा उठता है सारा तन ?
आनन्द की अभिलाषा में यह मन, छुना चाहता है क्यों वो दामन ?


क्यों फासलों का दर्द इतना गहराता जा रहा है ?
क्यों साँसो का प्रवाह, तीव्र वेग से उफन रहा है ?
मन्दिर की सी अनूभूति क्यों है आत्मा को ?
क्यों तेरी याद की पोटली खुद-ब-खुद खुलती जा रही है ?

भावनायें क्यों शब्दों का रूप लेने में विफल हैं ?
और क्यों शब्द यह कह गूंज रहें हैं कि ”तुम प्रेम हो ....







Darshan Mehra

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पितृत्व – एक यात्रा

on Sunday, August 17, 2008





लेखन, एक संतुष्टि और एक आवश्यकता बन चुका है मेरे लिये ! एक निश्चित समयांतराल के पश्चात अंत: से आवाज आती है कि कुछ भावनाओं को शब्दों के रूप में उकेर कर संतुष्टि पायी जाय ! संतुष्टि अपने कच्चे-पक्के लेखक को प्रौढ् बनाने की कोशिश की !
आज का लेख मेरे लिये दिल के करीब है क्योंकि विषय के नायक पाँच बच्चे हैं
सोना , सूबी , सज्जाद , साबरीन और जुलेखा !

पृष्ठ्भूमि से प्रारंभ करते हैं ! आज से ठीक एक वर्ष पूर्व यानि 15 अगस्त 2007 को हम 10-12 युवक-युवतियाँ स्वतंत्रता दिवस मनाने पहुँचे एक स्कूल में “नई दिशा फ्री एजुकेशन सोसाईटी नोएडा “ ! कुछ भारतीय सेना के के सेवानिवृत अधिकारीयों ने करीब 12-15 वर्ष पूर्व इस स्कूल की नींव रखी ! यह स्कूल गरीब तबके के बच्चों की निशुल्क पढाता है ! स्वतंत्रता दिवस का वह समारोह मेरे लिये बहुत ही प्रेरक था ! हम लोग इतने युवा होने के बावजूद AID-PRAYAS (यानि हमारा प्रयास) में केवल शनिवार – रविवार की कक्षायें चलाने में पूरी तरह से सफल नही हो पा रहे थे ! और उन लोगों ने वृद्ध होने के बावजूद सफलता को नमन किया था ! हाँलाकि मैं मानता हूँ कि हम युवाओं के पास रोजगार एक ऐसा क्षेत्र है जो हमारे लिये समय की बाध्यता उत्पन्न करता है !

प्रयास के काफी सारे बच्चों( तकरीबन 20 बच्चे) का सरकारी विद्यालय में प्रवेश तो करा दिया था परंतु सरकारी प्रबन्ध की असफलता यहाँ भी मौजूद थी ! बच्चे स्कूल तो जाते हैं परंतु उनका मानसिक और शैक्षणिक विकास सही तरीके से हो ऐसा वातावरण नही है ! कक्षा चौथी-पाँचवी के बच्चे हिन्दी पढना नही जानते ! विजय भैया की प्रेरणा से सितम्बर 2007 से मैने केवल हिन्दी मात्रा और लेखन की कक्षायें लेनी शुरू की ! बहुत मेहनत के बाद बच्चों का हिन्दी भाषा-ज्ञान सुधर रहा था ! लेकिन एक अडचन थी वह ये कि हम बच्चों को केवल सप्ताहंत (शनिवार-रविवार ) में पढा पाते थे ! इसी मध्य हमें पता चला कि “ नई दिशा” स्कूल हमारे बच्चों को भर्ती कर सकता है ! अगर बच्चे परीक्षा उतीर्ण कर जायॆं ! यह बहुत बडी आशा की किरण थी हमारे लिये ! सभी Volunteers इस दिशा में सोच तो रहे थे परंतु कुछ ठोस कर पाना मुश्किल हो रहा था ! वजह यही कि सप्ताह में दो दिन पढाने से अपेक्षित परिणाम हासिल करना असंभव था ! काफी मेहनत के बावजूद जब सब कुछ व्यर्थ सा लगा तो एक दिन मैंने अरूण से बोला “ यार मैं बच्चों को रोज पढाना चाहता हूँ , पर कैसे पढाया जाय ये नही पता “ ! यद्यपि कठिन था पर इसका जवाब मैंने स्वयं ही ढूँढा ! रात को आफिस से आने के उपरांत 9 से 11 बजे तक पढाया जा सकता था !

जनवरी 2008 के प्रथम सप्ताह से रात्रि कक्षा शुरू की ! मुझे लगा था कि मैं अकेले ही कर लूँगा पर बहुत मुश्किल था , समय हर मुश्किल का जवाब दे देता है ! विकास और कनन ने भी साथ आना शुरू किया ! और हम तीन लोगों की टीम धीरे-धीरे लक्ष्य प्रप्ति के लिये लग गये ! लक्ष्य कठिन था क्योंकि ENGLISH जैसा विषय बच्चों के लिये बिल्कुल नया था औअर हमारे पास केवल 3 महीने थे !
पितृत्व का दौर अब शुरू हुआ ! पहली कक्षा A-B-C-D से शुरू हुई ! प्रत्येक कक्षा के बाद हम एक-एक बच्चे के लिये कुछ नया-नया प्लान बनाते ! सज्जाद को Drawing पसन्द थी तो उसको Drawing की मदद से पढाते थे ! सोना गणित में कमजोर थी तो उसकी गणित पर विशेष ध्यान दिया जाता था ! मुझे याद है कि small a-b-c-d शुरू करने में हम कितना घबरा रहे थे परंतु बच्चे “ नई दिशा “ जाने के लिये दृढ थे ! हमारी कक्षा का सबसे बडा मकसद रहता था “एक अच्छा ईंसान बनाने की नींव रखना” ! आज बच्चे झूठ नही बोलते,गाली नही देते,साफ-सुथरे रह्ते हैं आपस में लडते तो हैं पर मदद भी करते हैं !

मेरे लिये जनवरी से अप्रेल तक के वो तीन माह एक तपस्या के समान थे ! पढने के अलावा जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात थी वह ये कि हम लोग बच्चों के लिये एक पिता की तरह मह्सूस करने लगे थे ! अगर एक दिन कक्षा न जाओ तो बच्चे हम तीनों में से किसी दूसरे के फोन से फोन कर देते थे और सबसे पहला सवाल होता थ कि “सरजी आप क्यों नहीं आये ?“ ! हम लोग भी अगले दिन उनसे मिलने के लिये अत्यधिक उत्सुक रहते थे !

मार्च 2008 के आखिरी सप्ताह का वो दिन जब बच्चों का TEST था “नई दिशा” में ! मैं अपने बोर्ड की परीक्षा के लिये इतना नहीं घबराया कभी जितना इन बच्चों के TEST के लिये घबराया था ! मैं रोज पूजा नहीं करता हूँ पर उस दिन बच्चों की सफलता के लिये भगवान के द्वार भी पहुँच गया ! कनन अपने हर पेपर से पहले मम्मी से बात किया करता था अच्छे परिणाम के लिये ! और बच्चों की सफलता के लिये उस दिन भी उसने सुबह-सुबह मम्मी से फोन पर बात की :) !

बच्चों ने TEST में बहुत अच्छा नहीं किया क्योंकि यह वातावरण उन्होंने पहले नहीं देखा था ! और वैसे भी 3 माह में A-B-C-D से ENGLISH पढ – लिख सकने की उनकी हिम्मत काबिले-तारीफ तो थी परंतु यह वातावरण बिल्कुल नया था !

नई दिशा के मैनजमैंट से हमको एक प्रकार से लडाई लडनी पडी अपने बच्चों का पक्ष रखने में और आखिरकार सोना और सूबी कक्षा 3 में और जुलेखा , सज्जाद और साबरीन कक्षा2 में प्रवेश पाने में सफल हुए ! हम सबने यह सफलता को बहुत विशेष तरीके से मनाया ! Cake काटा गया और बच्चों को उनकी सफलता के लिये treat दी गई ! हम सब आनंदित थे विशेषत: क़नन ,विकास और मैं ! हमारे भीतर का पितृत्व बहुत सुखद मह्सूस कर रहा था !

        और आज का 15 अगस्त हम पून: “ नई दिशा” पहुँचे और संयोगवश केवल हम तीनों यानि मैं ,कनन और विकास ! आज हम पिछ्ले साल की तरह केवल volunteers की तरह नहीं गये थे वरन हम अभिभावक की तरह पहुँचे थे ! हमारे बच्चे अपने दोस्तों को बुला-बुलाकर बोल रहे थे कि ये हमारे दर्शन सर ,विकास सर और कनन सर हैं ! उस क्षण की खुशी को व्यक्त करना कठिन है !
           मैं कह सकता हूँ कि 15 अगस्त 2007 से 15 अगस्त 2008 तक देश ने विकास किया हो या न हो ,देश ने आजादी मह्सूस की हो या नही हो ! परंतु सोना ,सुबी ,जुलेखा,साबरीन और सज्जाद ने जरूर आजादी को मह्सूस किया होगा ,
                             

“अज्ञान से ज्ञान की आजादी, बेहतर शिक्षा पा सकने की आजादी “

शाम को AID-PRAYAS के 15 अगस्त समारोह में हमारी पितृत्व भावना उच्चतम स्तर पर थी जब इन बच्चों ने सबको यह कह सुनाया !

Thank You God for the world so sweet,
Thank You God for the food we eat,
Thank You God for the birds that sing,
Thank You God for everything!

Amen !!




A video which was created for AID-Noida can be viewed on the context of above story ..
https://www.youtube.com/watch?feature=endscreen&v=ydbmBc0biLo&NR=1





Darshan Mehra


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प्रेमचंद्र् के गाँव

on Wednesday, May 7, 2008




महान
साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद्र सही मायनों में हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ युग का प्रतीक हैं ! 1880 से 1936 तक के छोटे से जीवनकाल में मुंशीजी ने हिन्दी साहित्य की जो सेवा की उस मील को शायद ही कोई छूँ सके ! मेरे इस लेख की प्रेरणा मुंशी जी की लेखनी की वह मौलिकता है जो कि उनके जीवनंतराल के ग्रामीण भारत की स्पष्ट प्रतिविम्ब पेश करता है !

मैं अकसर अपने अनुभवों को आप सब (पाठकों) के साथ बाँटता हूँ जहाँ कल्पना और अमौलिकता के लिये प्राय: स्थान नहीं होता ! और मैं पून: उपस्थित हूँ अपने इस चिरपरिचित अन्दाज के साथ !!
आज के लेख का शीर्षक मेरे मस्तिष्क में उस समय आया जब मैं अपने गाँव में रात के अन्धेरे में पंचलाईट(LPG Petromax Light) जलाने की कोशिश कर रहा था ! लगभग 3-4 लोग लगे हुए थे एक बडे सिलिंडर में से 4-5 छोटे-छोटे सिलिंडरों में गैस भरने में ! कभी नट-बोल्ट खोलने वाली चाँबी का नम्बर कम पड जाता तो कभी सिलिंडर के नोजल से गैस रिसने लगती पूरे बाखली ( 4-5 घरों का क्रम जिनके आँगन जुडे हुए हो) में गैस की तीव्र गंध फैलने लगी ! यह अभ्यास इसलिये नहीं हो रहा था कि गाँव में बिजली नही थी ! बल्कि इसलिये हो रहा था कि गाँव में अकसर लोग उन समारोहों पर बिजली काट देते हैं जब किसी न चाहने वालों के घर खुशी के दीप जल रहे हों ! प्राय: ये लोग ईर्ष्या और संकीर्ण मांसिकता से ग्रसित होते हैं !

प्रेमचंद्र की कहानियों के पात्र आज से 100-150 साल पहले भी कुछ ऐसे ही हुआ करते थे ! कोई हल्कू के गेहुँ के खेत में अपने गाय चरने डाल देता था तो कोई गाँव की नहर को तोड कर लोगों की फसल नष्ट कर देता था ! मेरा गाँव छोटे पहाडी शहर से 3-4 किमी. दूर है इसलिये विकास की पौंध यहाँ बोई तो जाती है पर उसको पनपने नहीं दिया जाता ! पानी के नल हर दूसरे घर में हैं ,
टेलिफोन की लाईन कम से कम 40 घरों में है यहाँ
तक की रसोई गैस के लिये सिलिंडर हर घर में पहुँच चुका है ! काफी समय से एक जंग चल रही थी वह थी सडक निर्माण की ! मैने पापाजी को कई सालों से “सूचना के अधिकार” यानि आज कल के बहुचर्चित RTI एक्ट का उपयोग करते देखा है ! मैने कई बार पापाजी को लखनऊ और बाद में देहरादून की सरकारी गलियारों के लिये फाईल तैयार करते हुए देखा है और इन फाईलों का विषय हमेशा एक ही होता था “गाँव में सडक-निर्माण “ पापाजी सरकारी कर्मचारी हैं इसलिये हमेशा पत्राचार भेजने वाले की नाम की जगह मम्मी का नाम होता था :) ! और खास बात यह है कि इस बार जब् मैं गाँव गया था तो रोड के लिये काम आधा हो चुका था और साल भर में गाँव में सडक पहुँच चुकी होगी ! आखिरकार उस प्रयास में पापाजी(मम्मी के नाम के साथ :) ) सफल हो ही गये जिसको देखते-2 मैं बच्चे से बडा हो गया !

एक अल्फाज जो मैं अक्सर प्रयोग करता हूँ वह है असमाजिक तत्व , ये वो प्राणि होते हैं जो समाज को दूषित करने में आनन्द उठाते हैं !
गाँव की टेलिफोन लाईन की बात करते हैं ,जमीन के भीतर से फाईबर बिछी हुई है और असमाजिक तत्वों का कृत्य देखो ,वो या तो जमीन को खोद के फाईबर को काट देते हैं या फिर उसमे आग लगा देते हैं ! प्रत्येक वर्ष दो या तीन बार ऐसी घटना जरूर घटती है ! पानी की लाईन का भी कुछ यही हाल है गर्मीयों में कुछ लोग अपने खेतों की सिंचाई करते हैं तो कुछ को पानी के लिये 2-3 किमी. चलना पडता है ! लेकिन एक बात है जो कि “प्रेमचंद्र के गाँव” में हमेशा से विद्यमान है वह है समाजिकता !

कितने भी असमाजिक तत्व क्यों न पनप जायें ,गाँव की समाजिकता को नहीं डिगा सकते !
गाँव मे आज भी अगर कोई वृद्ध बीमार पडता है तो कई नौजवान कंधे तैयार है डोली (सामान्यत: शादी के दिन दुल्हन को डोली में बिठा कर विदा किया जाता है ) में वृद्ध को अस्पताल पहुँचाने को ! 3-4 किमी. की ठेठ चडाई जिसमें अकेले चढना मुश्किल होता है कंधे पर डोली लेकर मरीज को अस्पताल पहुँचाया जाना समाजिकता का ही प्रतीक है ! किसी चोटिल हो चुके बैल/गाय को रात्रि में बाघ के भक्षण के लिये नही छोड़ा जाता बल्कि कई सारे युवा उसे कंधों पर लाकर गौशाला तक पहुँचाते हैं ! और अगर गरीब की लडकी की शादी होती है तो गाँव के लोगों की भागीदारी का यह आलम होता है कि समारोह की सफलता पर कोई भी आशंका न रह सके ! एसे कई उदाहरण हैं जो इस समाजिकता का बखान भली-भाँति करते हैं !

इस लेख का उद्देश्य कोई निष्कर्ष निकालना नही है वरन इस तथ्य से भिज्ञ करवाना है कि “प्रेमचंद्र के गाँव” ज्यादातर मामलों में आज भी उसी पग पर खडे हैं जहाँ आज से 100 साल पहले थे ! ऐसे समाजिक और असमाजिक विभाजन कई प्रकार के हैं परंतु एक बात जो आज के परिदृश्य में भी सत्य है वह ये कि समाजिकता जो कि बडॆ शहरों में बहुत तीव्र गति से विलुप्त होती जा रही है वह गाँवों में संघर्ष तो कर रही है परंतु असमाजिक तत्वों को पट्खनी देने में अभी भी सक्षम है !





Darshan Mehra

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क़विता..

on Wednesday, February 20, 2008




भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास का प्रमाण – दिल्ली मैट्रो !!
मेरे लिये सप्ताह के पाँच दिन दिल्ली मैट्रो से यात्रा करना एक आदत ही है ,परंतु ये क्या ? आज तो रविवार है और आज भी मैट्रो से यात्रा ? और वो भी मै अकेला नहीं मेरे साथ दो और लोग !
मुझे याद नहीं कि किस बात से हम तीनों बचपन की यादों में चले गये ! और शुरू हुआ दौर, बचपन में स्कूल में की गई गलतियों का वर्णन करने का :) !!
मुझे याद है कि कक्षा 9 में समाजिक विज्ञान में एक प्रश्न था !
प्र. आपरेशन फ्लड क्या होता है ?
मेरा उत्तर था, जिस कक्ष में घातक बीमारीयों से सम्बन्धित सामान जो आप्रेशन के समय काम आये रखे जाते है ,उस कक्ष को आपरेशन फ्लड कहा जाता है ,इस कक्ष में ही घातक बीमारीयों के आपरेशन भी किये जाते है :) ! वास्तव में आपरेशन फल्ड भारत में आयी दुग्ध क्रांति (श्वेत क्रांति ) को बोला जाता है ! हा हा :)

ऐसा ही जवाब था चौहान के सह्पाठी का
प्र. कबीर के जीवन पर प्रकाश डालिये ?
उसने कुछ लिखे बिना एक चित्र बनाया जो कुछ नीचे बने चित्र जैसा था शायद आप खुद ही समझें :) :)


फिर एक बच्चे की कापी याद आयी जिसने लिखा था
प्र. गाँधीजी कहाँ पैदा हुए थे ?
उ. गाँधीजी गाँधी चौक पर पैदा हुए थे :) :)
इन सब मस्ती भरे और हास्यास्पद किस्सों पर ठहाके मारते हुए ,हँसते हुए हम तीनों (मैं ,सेल्वा और अरुण ) दिल्ली विश्वविद्यालय मैट्रो स्टेशन पहुँचे ! वहाँ से साईकल – रिक्शा से तीमारपुर के एम.सी.डी. गोदाम पहुँचे,जहाँ AID-आशायें नाम से युवाओं का एक संगठन एक समुदाय के बच्चों की शिक्षा के लिये कार्यरत हैं !
अरे यह मेला सा क्या लगा हुआ है ? टेन्ट वाले ने उस छोटे सी जगह को एक अच्छा सा मंच बनाने में अच्छी कोशिश की थी !
ना होली है,ना दीवाली,ना ही 15 अगस्त और ना तो 26 जनवरी,तो ये कैसा मेला है ? इतने सारे बच्चे और बच्चों का उत्साह, देखने योग्य था , और किसी भी त्यौहार से बेहतर लग रहा था ! पूरे समुदाय के ढेर सारे बच्चे इंतजार में थे कि कब उनकी जिज्ञासा का अंत होगा कि आखिरकार यहाँ क्या होने वाला है !स्वयं में एक प्ररेणा, विजय भैया सपरिवार मुख्य द्वार पर खडे थे ! मैने बचपन में किताबों में पढा हुआ है कि महान लोगों का ललाट (माथा) ओजस्वी और तेजपूर्ण होता है, और भैया से मिलकर मुझे बचपन की वह बात बार-बार याद आती है !


तकरीबन 8-9 साल की एक छोटी सी बच्ची विजय भैया के गोद में बैठने को आतुर हो रही थी ,मुझे लगा वह बच्ची भैया को पूर्व से जानती है ! भैया ने थोडी देर उसको गोद में बैठाकर नीचे उतारा,फिर वो मेरी गोद में आने लगी, सेल्वा ने बताया कि यह बच्ची हमेशा ही किसी ना किसी की गोद में बैठने का प्रयत्न करती है ! पहले थोडा अजीब लगा मुझे पर बाद में उस बच्ची की लालसा देख कर मैंने उसे गोद में ले लिया!
मैंने उससे नाम पुछा तो वो कुछ नही बोली ! मेरे चेहरे को छुने लगी, मुझे धीरे से थप्पड मारने लगी ! यद्यपि सभी बच्चे प्यार और अपनेपन की भाषा को बहुत खूब समझते हैं मगर ये बच्ची तो स्वयं में ही प्रेम के दीप के समान थी ! उसे इस बात की परवाह नही थी की वो किस के गोद में हैं ,उसे यह भी नहीं पता था कि मैं कौन हूँ !
उसे परवाह थी तो यह की वो कैसे प्यार करे और उसे कैसे प्यार मिले !


मुझे कुछ – कुछ असाधारण सी लगी यह बच्ची ,वह केवल किसी से भी प्यार पाने को उत्सुक रह्ती थी ! मुझे सेल्वा ने बताया कि उस बच्ची का नाम “ क़विता “ है और वह मानसिक रूप से कमजोर है !! एक पल के लिये मेरा मन दुखी हुआ लेकिन फिर मैंने सोचा कि सही में इस दुख का कोई वास्तविक कारण है भी या ये एक मिथ्या है ! जितने भी लोग इस आयोजन में सम्मिलित थे उनमें से “कविता” एक मात्र इंसान थी जिसे केवल एक ही भाषा का ज्ञान था ,प्यार की भाषा !!! क्या यह दुखी होने का कारण हो सकता है ? कदापि नहीं !! और मैं पून: खुश हो गया !
"" मेरे विचार से क़विता हम सब में श्रेष्ठ थी !""


जैसे ही मंच पर कार्यक्रम शुरू हुआ , एक बहुत सुंदर नाटक का मंचन किया गया, और यह नाटक भी “कविता” के उपर आधारित था ! कहानी का सारांश यह था कि हमें कविता के साथ भी एक साधारण इंसान के समान व्यवहार करना चाहिये ! काफी प्रभावशाली मंचन था बच्चों के द्वारा !!
कविता अभी भी मेरे गोद में बैठी हुई, मंच पर अलग – अलग कार्यक्रमों को देखती और अंत में मेरे साथ तालियाँ जरूर बजाती ! अचानक से एक धमाकेदार गीत(आजा नच ले....) चला जिस पर 3-4 छोटी लडकियाँ मंच पर नाच रही थी ! कविता मेरे गोद से तुरंत उतरी और मंच की तरफ भागने लगी ! पहले तो सारे लोगों ने उसे रोकना चाहा जबकि मैं चाह रहा था कि उसको मंच पर जाने दिया जाये , थोडी देर में वो मंच पर नाचने लगी :) ! उसकी खुशी का आलम नहीं था ! अगर अतिश्योक्ति का प्रयोग करूँ तो


“ कविता ऐसे नाच रही थी जैसे बेसुध होकर मीरा कृष्ण-प्रेम में नाचती होगी “ लेकिन कविता जीवन प्रेम में नाच रही थी शायद ! हमारी तरह उसके मस्तिष्क की सीमायें ,परिवार ,स्कूल,समाज,देश,ज्ञान और विद्या के दायरे में खत्म नही हो जाती ! उसका जीवन अनंत सीमाओं को छू सकता है !
इस छोटी सी बच्ची को मानसिक कमजोर बोलना गलत होगा चूँकि ये लडकी तो ईश्वर के सबसे करीब है !
सारे कार्यक्रम को AID-Aashayen ( आशायें ) के सदस्यों ने बहुत ही प्रभावशाली बनाया था ,समुदाय के छोटे और कुशाग्र बच्चों का कुशल अभिनय,नृत्य और आत्मविश्वास देखने योग्य था ! बच्चों ने मंच पर आकर अपने भविष्य की आकाँक्षायें बतायी कि कोई ईंजीनियर बनना चाहता है तो कोई पूलिस वाला,यह सब सुनना निसंदेह सुखद था,बहुत प्रेरक था !
यद्धपि कविता नही बता सकती है कि वो क्या बनेगी या क्या बनना चाहती है लेकिन क्या उसे इन समाजिक महत्तवकाक्षाओं और भौतिकता वादी लक्ष्यों की आवश्यकता है भी ?
उसके लिये जीवन में खुशी और प्यार ही काफी है बल्कि काफी हद तक हमारे लिये भी ये दोनों चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है जो शायद हम भूल जाते है !!





Darshan Mehra

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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ..

on Monday, January 14, 2008



On 5 July 1943,
Netaji took over the command of the Indian National Army, and then
christened Azad Hind Fauj (Free India Army). Arrived from Manila in time to review the
parade of troops standing alongside with Rashbehari Bose, the founder of Indian National
Army. Addressing the soldiers, Netaji said:

अपने पूरे जीवन से मैं सीखा हूँ कि-
हिन्दुस्तान के पास वो हर एक चीज है जो आजादी के लिये आवश्यक है ,अगर कोई कमी है तो वो है एक सेना की, “आजादी की सेना” !!!
वाशिंगटन ने अमेरिका को ऐसी ही सेना के बल पर आजाद करवाया ,इटली को आजादी ऐसी ही सेना ने दिलवायी ! आप खुद को सौभाग्यशाली समझो कि “आजाद हिन्द फौज“ बनाने में आप लोग सबसे पहले आगे आये !
जवानो ,मुझे नही मालूम की हम में से कितने लोग इस आजादी की लडाई के बाद जीवित बचेंगे ! पर मैं इतना जरूर जानता हूँ कि, आखिरकार जीत हमारी होगी !
हमारा मक्सद तब तक पूरा नहीं होगा जब तक कि हम में से जीवित बचे हुए योद्धा दिल्ली में बैठे अंग्रेजी कुशासन को कुचल कर जीत का बिगुल न बजा दें !

जवानों दिल्ली चलो, तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हें आजादी दूँगा ! जय हिन्द !!!!

सच कहुँ तो उपरोक्त लेख मैने AID-Aashayen के बच्चों के Fancy Dress Competition के लिये तैयार किया था, या ये कहना चहिये कि मैने हिन्दी रूपांतरण किया ,परंतु Internet से काफी कुछ पढ्ने को मिल गया ! Internet के द्वारा महान राष्ट्रवादी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महनायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन का विस्तुत ज्ञान हुआ!

काफी कुछ पढने के पश्चात दो विचार मेरे जहन में उठे !!!
1. क्या प्रत्येक भारतीय जनमानुष सही मायनों में स्वतंत्र हो चुका है ?
अगर हाँ तो, क्या ऐसी ही स्वतंत्रता को हासिल करने के लिये इतना संघर्ष किया गया था ? आशय यह है कि हम स्वतंत्र तो हैं इसमे कोई शक नही है परंतु हम में से कितने लोग स्वतंत्र हैं ?
देश के 37 % लोग आज भी दो जून की रोटी के लिये मोह्ताज हैं और एक तिहाई जनता प्राथमिक शिक्षा तक नही पाती है !

2. लेकिन असल सवाल जो मेरे दिमाग को परास्त कर गया वो यह कि सही मायनों में इतने बडे देश को इतने सूक्ष्म साधनों के दम पर,
कैसे देश को हमारे महानायकों ने स्वतंत्र कराया होगा ?
नेताजी ने तो देश से बाहर रह्कर ही “आजाद हिन्द फौज” को नेतृत्व प्रदान किया ! सच बोलूँ तो शायद यह कहना कतई अतिशयोक्ति नही होगा कि हमें पूनः एक और क्रांति की जरूरत है जो आजादी की लडाई के समान एक बार फिर से, देश के प्रत्येक नागरिक को अशिक्षा और भूख की दासता से मुक्त करें !
क्या ऐसी क्रांति के लिये आज हमारे पास नेताजी जैसे सशक्त महानायक हैं ?

नेताजी को समर्पित ..


Darshan Mehra

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लेख..

on Friday, November 30, 2007




मुझसे हिन्दी में कुछ लिखने को कहा गया है ,मैं लिखना भी चाहता हूँ ,परंतु अपने विचारों को कलमबद्ध करने में एक बाधा आ रही है और वह है एकाग्रता !
ऐसा नही है कि मैं इस अवसर का सदुपयोग नही करना चाहता लेकिन मेरे मष्तिस्क मे तीन अलग-2 विषय चल रहे हैं !
i.) हिन्दी और पाश्चात्य सभ्यता का हिन्दी पर प्रभाव
ii.) मेरा AID के साथ अनुभव
iii.) Volunteering का मक्सद - एक सच

फिर सोचा,क्यों न तीनों विषयों पर अपना दृष्टिकोण पेश करूँ !
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मुझे अंग्रेजी (English) भाषा के प्रयोग से कोई व्यक्तिगत दुख हो ,बल्कि मेरा तो मानना है कि अंग्रेजी सर्वमान्य वैश्विक (ग्लोबल ) भाषा का दर्जा पा चुकी है ! और आज जब तकनीक और विकास ने राष्ट्र की सीमाओं को समाप्त सा कर दिया है तो एक सर्वमान्य वैश्विक भाषा का उदगम अवश्यंभावी है !
इस दृष्टिकोण से अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य सा लगता है ,लेकिन याद रहे कि “हिन्दी” हमारी मातृ भाषा है ! और अगर बडे शहरों के तथाकथित बडे शिक्षा संस्थान से पढा-लिखा नौजवान/ नवयुवती यह कहे कि “ मुझे हिन्दी पढने,लिखने या बोलने में कठिनाई होती है “ तो यह हमारी राष्ट्रीय सभ्यता व संस्कृति पर आघात है !
मैं कई ऐसे व्यक्तियों को जानता हूँ जो हिन्दी का उच्चारण भी अंग्रेजी की तरह करते हैं , और अंग्रेजी को उच्च भाषा का दर्जा देते हैं ! जबकि मेरा ऐसा मानना है कि
प्रत्येक भाषा अपने आप में महान होती है चाहे वह मूक – बधिर व्यक्ति की “ इशारों वाली भाषा “ ही क्यों न हो !
उपरोक्त वर्णित द्वितीय विषय के बारे में मेरा मत है कि AID (Association for India’s Development – हिन्दी में “भारत विकास संगठन” ) के साथ कार्य करके एक सबसे बडी बात मैं जाना हूँ ,कि हम AID से जुडे युवा, जो कि शिक्षा ,रोजगार,परिवार और समाज के दबावों को ढोते हुए ,हर क्षण अलग-2 सैकडों प्रतियोगिताओं और बाध्यताओं के बावजूद ,एक सकारात्मक मानसिकता से ग्रसित हैं ! ऐसी मानसिकता जो समाज और राष्ट्र के लिये हितकारी है ! यह मानसिकता है “ विकास की मानसिकता “ , “ समाजिक परिवर्तन की मानसिकता “, और अगर सही शब्दों में बोला जाय तो यह मानसिकता
“कमाल” कर सकती है अगर राष्ट्र का हर नागरिक इस मानसिकता का अनुग्रहण करे !
मैं AID का धन्यवाद करूँगा कि मुझे ऐसा मंच प्रदान किया,जहाँ मैं कई ऐसी मानसिकता वाले युवाओं से मिला ! लेकिन एक बात की तरफ मैं ध्यान खींचना चाहुँगा, कि मानसिकता से ज्यादा मह्त्त्वपूर्ण हमारे कृत्य ( या कर्म ) हैं जिनसे हम सही मायनों में एक “समाजिक परिवर्तन “ बन सकते हैं


Volunteering हमें वह मंच प्रदान करता है, जहाँ हम इस मानसिकता के साथ अपने कर्मों से, समाज के उस वर्ग के लोगों के जीवन में “एक परिवर्तन” बन सकते हैं जिस वर्ग को सत्ता और समाज अनदेखा कर देता है ! यह वर्ग जिसे हमारे जैसे युवा हाथों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है ! वैसे भी सच ही कहा गया है कि

“Helping hands are better than praying lips!!!! “

अगर सारांश निकालूँ तो यही कहुँगा कि Volunteering करने की पीछे हमारा असल मक्सद केवल हम ही जानते हैं परंतु अगर हम “ समाजिक परिवर्तन “ बनने में सूक्ष्मतम भागीदार भी न बन सके तो यह एक Volunteer की सफलता नही मानी जा सकती !!




Darshan Mehra

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अनुभव

on Thursday, November 1, 2007



दिन शनिवार,तारीख 20 अक्टूबर 2007 ,समय दोपहर के 12:30 बजे
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लम्बा कुर्ता और जींस पहने हुआ यह् युवक, शायद 3-4 दिनो से दाडी नही बनायी थी उसने,वो चल दिया अपने एक मित्र से मिलने ! दोनों ही एक संस्था के लिये काम करते हैं,कई मामलों में सिद्धांत: दोनों की विचारधारा एक समान है ! उसका मित्र दिखने में दुबला-पतला है पर उसके विचार बहुत सशक्त्त हैं, और दोनों ही इस संस्था के जरीये व्यवस्था को झकझोरना चाह्ते हैं !

आज की मुलाकात एक खास मकसद से है,जिस संस्था के लिये ये दोनो काम करते हैं एक युवती उस संस्था के बारे में जानना चाहती है ताकि वो देश-विदेश से इस संस्था के लिये पैसा इकटठा करने में इन दोनों की मदद कर सके ,लेकिन इससे पहले की वो इस संस्था के लिये काम करे वो इन लोगों की विचारधारा से अवगत होना चाहती है ! इनके कार्य की विश्वसनीयता से वाकिफ होना चाहती है !
इस युवक के मित्र ने उस युवती को 11:00 बजे एक बडे से शापिंग काम्पलेक्स (मॉल ) में बुलाया था ,सभी युवतीयाँ अक्सर सही समय में पहुँच जाती हैं लेकिन लडके वो तो हर जगह देरी से पहुँचना अपना धर्म समझते हैं शायद J ,और वो दुबला युवक अभी तक नहीं पहुचा था !
इस माँल में सुरक्षा की कडी व्यवस्था है, और इस सुरक्षा को भेदना काफी कठिन है पिछले एक घंटे से वो युवती इस माँल के प्रथम-तल के कई चक्कर लगा चुकी है ,और इस बीच कई लोगों से लगातार फोन पर बातें भी कर रही है ,शायद समय बिताने का इससे अच्छा तरीका उपलब्ध भी नही था ! लेकिन इस बीच इस युवती की कुछ करीबी मित्रों से बात होने लगी, बात करते-2 युवती इस माँल के पूरे निचले तल का मुआयना कर चुकी थी ! निचले तल पर महिला शौचालय में जाते समय युवती अपने किसी मित्र को कुछ समझा रही थी,
वो युवती ये सारी बातें बकायदा आज की ग्लोबल भाषा “ENGLISH “ में कर रही थी , मेरे विचार से इस भाषा का ज्ञान होना उचित है परंतु आज की मैट्रो शहरों की युवा पीढी का ये हाल है कि उन्हें यह कह्ते हुए फक्र होता है कि “ मुझे हिन्दी पढ्ना- लिखना ठीक से नहीं आता “ और यही उदगार हमारे प्रिय “विजय भैया ” के भी हैं ! खैर ...
शौचालय जाते समय उस युवती का दो निगाहें पीछा कर रही थी ,जैसे ही युवती ने पीछे देखा,एक महिला नीले और सफेद रंग की धारीदार सलवार-कमीज पहनी हुई ,इस युवती को घूर रही थी,युवती ने महिला को देखते ही ,अकस्मात ही मोबाईल से बातें करना बन्द कर दिया ! युवती ने ध्यान दिया की ये महिला इस माँल की प्राईवेट सुरक्षा ऐजेंसी की सदस्या है ! महिला पाँचवी (5th class) से ज्यादा पढी-लिखी भी नही होगी !
तकरीबन 10 मिनट के बाद वह दुबला-पतला युवक इस युवती से माँल के निचले तल पर बने हुए काँफी-शाँप पर मिला! प्रारम्भिक परिचय के बाद दोनों उस संस्था के बारे में बातें करने लगे ! युवक जुकाम से परेशान था इसलिये बोलने मे भी कठिनाई हो रही थी उसे ! इसलिये उसने अपने उस मित्र को बुला लिया ताकि वो संस्था के बारे में
विस्तार से बता सके ! करीब 12:45 बजे उसका मित्र पहुँचा ! लम्बा कुर्ता और जींस पहने हुआ यह् युवक संस्था को मजबूत करने के विषय में वार्तालाप करने लगा ! पतले युवक के पास एक काला बैग था जो कि टेबल के नीचे रखा हुआ था !
अभी 15 मिनट भी नही हुए थे इन तीनो को बातें करते हुए कि एक पुलिस इंस्पेक्टर और कुछ सुरक्षा कर्मी उस काले बैग को देखते हुए इन तीनों की टेबल की तरफ बढे ! माँल के सुरक्षा विभाग के लोग और वो महिला सुरक्षाकर्मी जो उस युवती का पीछा कर रही थी भी इन सबके साथ थी ! पुलिस इंस्पेक्टर सहित सभी सुरक्षाकर्मी इन तीनों को एक अजीब सी शक भरी निगाहों से देख रहे थे ! तीनों घबरा से गये थे !
युवती ने इंस्पेक्टर से पुछा “ क्या बात है ? इंस्पेक्टर ने इशारे से इन तीनों को अपने पीछे आने को कहा,जब तक ये लोग कुछ समझ पाते इंस्पेक्टर ने तीनों से “Identity Card ” माँग लिये !जिस तरह से पुलिस बल आयी हुई थी लगता था कि कुछ गम्भीर मामला है ! तीनों को माँल के सुरक्षा कक्ष में ले जाया गया,एक-2 करके तीनों से स्थायी निवास का पता,फोन न.,और इस शहर में रहने का कारण पुछा गया ! जिस तरह से यह तहकीकात चल रही थी उससे लग रहा था कि पुलिस ये मान चुकी थी कि ये तीनों किसी आतंकवादी संगठन से जुडे हुए हैं !
चूँकि दोनों युवक उस युवती से पहली बार मिल रहे थे तो उनके मस्तिष्क में युवती के लिये,और युवती के मस्तिष्क में इन दोनों के लिये एक शक की सूई घुमने लगी ! बहुत पुछने पर पुलिस ने बताया, कि महिला सुरक्षाकर्मी ने उस युवती को शौचालय के अन्दर फोन पर कहते हुए सुना था कि “ security बहुत tight है , इस माँल में बम लगाना नामुमकीन है “ तीनों एक दुसरे को देखने लगे और ऐसा सुनकर हतप्रभ रह गये !!
युवती तो महिला सुरक्षाकर्मी के उपर भावावेश में आकर चिल्लाने लगी “कब सुना तुमने ऐसा ? सुरक्षाकर्मी बोली “ मैड्म एक साल से काम कर रही हूँ मैं यहाँ, आज तक तो ऐसा नही बोला मैंने “
तीनों से पुछ्ताछ होने लगी,लेकिन एक बात समझ से परे थी कि उस महिला सुरक्षाकर्मी ने उस युवती की अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप कैसे समझ ली ?तीनों थोडा घबरा भी गये थे क्योंकि परिस्थितियाँ भी तीनों के विरूद्ध थी ! पहले युवती का 11 बजे से एक घंटे तक माँल के निचले तल में घूमना ,12 बजे पतले युवक का आना ,फिर 12:45 में कुर्ते वाले युवक का इन के पास पहुँचना,तीनों का अलग-2 राज्यों से होना,अन्जान युवती का पहली बार मिलना वो भी किसी संस्था के लिये धन इकटठा करने के मकसद से ! ये सारी बातें इनके खिलाफ ही तो थी !
काफी अलग-2 प्रश्नों का जवाब देने के बाद जब तीनों परेशान हो गये तब युवती बोली कि वो एक सेना-अधिकारी की पुत्री है और ऐसे क्रुत्यों में शामिल होना तो दूर ऐसा सोचना भी उसके लिये असंम्भव है ! तीनों ने बताया कि असल में हम लोग भी राष्ट्र कि सेवा करना चाहतें हैं इसीलिये एक NGO (AID-Association for India’s Development
http://delhi.aidindia.org ) के लिये काम करते हैं और इसी सिलसिले में यहाँ मिले थे ! बहुत समझाने के बाद पुलिस ये मानी की तीनों कोई आतंकवादी नहीं है !
पुलिस की तत्परता देख तीनों को अच्छा लगा,लेकिन एक अनपढ सी बिना ट्रेनिंग पायी हुई महिला सुरक्षाकर्मी के द्वारा अनकही बात के सुनने पर इतना बवाल मचा दिया गया,एकबारगी के लिये तो इन तीनों को आतंकवादी ही समझ लिया गया था J ,और उपर से एक बात का और ज्ञान हुआ वो यह की पढे-लिखे लोगों से पुलिस इस तरह से व्यवहार करती है तो बेचारे अनपढ,लाचार और ग्रामीण परिवेश के लोगों से क्या व्यवहार होता होगा !
खैर !! यह अनुभव एक यादगार अनुभव था और आपको बताउँ की इस लेख में कुर्ता पहने हुआ युवक मैं स्वयं हूँ ,और मेरे साथ दुबला-पतला युवक और कोई नहीं अरुण था, अरुण AID-Prayas का volunteer है और वो युवती सोनिया थी ,जो कि प्रयास के साथ पिछले 15 दिनो से जुडी है ! और यह घटना PVR SPICE Mall,Noida की है
हमारा यह अनुभव हम तीनों के लिये अच्चम्भित करने वाला था !!! मुझे लगा कि आपको भी अपने अनुभव से अवगत कराउँ !!


इति


Darshan Mehra
darshanmehra@gmail.com

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