ईश

on Wednesday, June 16, 2010


            पिछले कुछ दिनों से मन काफी भारी सा था ! कुछ व्यावहारिकता के चलते ,कुछ अपेक्षाओं का बोझ और कुछ एकरसता ! इन्हीं सब ख्यालों के साथ थोड़ा बोझिल सा होकर शाम के करीब साढ़े सात बजे मैं "प्रयास" पहुंचा ! और हमेशा कि तरह बच्चे मेरे ऊपर झूलने को तैयार ,दर्शन सररररर......   
           कभी-कभी ये समझ नहीं आता कि इन बच्चों की यह ऊर्जा हमेशा एक सामान कैसे हो सकती है ! साधारणतः हम किसी से भी मिलें तो लोग औपचारिकता से मुस्कुराते तो हैं मगर वो चमक हर किसी कि आँखों में नजर नहीं आती जो ये प्रदर्शित करे कि हाँ फलां इंसान आप से मिलकर दिल से उतना ही गदगद महसूस कर रहा है जितना प्रदर्शित कर रहा है ! मगर प्रयास के बच्चों के मिलने में उनकी आँखों में वो चमक होती है जैसे उनको  "बर्फवारी के बाद की बेहद सूकूनदायक  और सुन्दर धूप " मिल गयी हो ! और ऐसा अभिवादन व अभिनन्दन मन को भीतर तक छूं  सा जाता है !


गौरव क्लास में कुछ भव्य इमारतों के बारे में बता रहा था तभी"स्वर्ण मंदिर अमृतसर " की बात आयी !

पूनम: सरजी गुरूद्वारा क्यों जाते हैं ?
शाहिद : तुझे इतना भी नहीं पता ,गुरूद्वारे में पूजा की जाती है !
चूंकी हमारे बच्चों का मंदिर मस्जिद के बारे में जानना स्वाभाविक है मगर गुरूद्वारे के बारे में शायद ज्ञान नहीं था सबको !

पूनम ने फिर पूछा "सरजी हम पूजा क्यों करते हैं"

  इस बार सूबी बोली "पूजा करने से या फिर नमाज पढ़ने से हमको जो मांगो वो मिल जाता है " अबकी बार पूनम ज्यादा विश्वास से जवाब देती है ! "कुछ नहीं मिलता है सर " !
अब बच्चों के इस वाद विवाद को मैंने ही चुप करवाना था तो सोचा पहले बच्चों से ही पूछ लिया जाय !
अच्छा बताओ बेटा पूजा या नमाज पढ़ने से किसको क्या मिला ?

सबसे पहले जाबांज ने हाथ खडा किया !
जाबांज : सर मुझे पहले ही कुछ समझ आता था और ही मैं पढ़ने में अच्छा था,फिर मम्मी ने बोला की पाँचों टाईम नमाज पढ़ना शुरू कर और देख खुदा कैसे तुझे तरक्की देता है !
११ साल का जाबांज सुबह बजे कि नमाज के लिए उठने लगा और नमाज के बाद नैसर्गिक सा पढने लगा ,बाल-मन को ये नहीं पता चला की खुदा ने उसकी मदद भी तब की जब वो अपनी मदद करना सीख पाया ! वैसे ये बता दूं कि जाबांज अब बहुत योग्य और कुशाग्र विधार्थी है !

सूबी : सरजी - साल पहले जब आप शुरू- में पढ़ाने आते थे तो मैं खुदा से मांगती थी कि "मुझे भी स्कूल जाना है " फिर पहले सरकारी स्कूल में हमारा दाखिला करवाया और बाद में नई दिशा में ,तो खुदा से मांगने पर मिल गया मुझे भी !
अब सूबी ये भूल गयी थी कि "नई दिशा" में एडमिशन होने के लिए उसने खुद रात के ११:३० बजे तक कडाके के ठण्ड के दिनों में क्लास करी है ,विकास,कनन या फिर मुझसे ! यहाँ पर भी बाल मन अपनी मेहनत का श्रेय खुदा को दे जाता है और थोड़ी सी विडम्बना ही है ना कि जैसे- हम बड़े होते हैं हम खुदा का श्रेय भी खुद को देने लगते हैं ,जैसे हम कैसे परिवार में पैदा हुए ,धन-धान्य कितना है ,कद-काठी कैसी है ..खैर वैसे सूबी कक्षा पांच में पहुँच चुकी है इस साल !
सूबी की कहानी से रीना भी इत्तेफाक रखते हुए कहती है कि हाँ सरजी मैं भी पूजा करती हूँ तो भगवान् मेरी बात मान जाता है

पूनम अभी भी असमंजस में थी !
पूनम : सरजी पर भगवान् मेरी बात तो नहीं सुनता ,ऐसा क्यों ?
बेटा क्या नहीं सूना भगवान् जी ने !
पूनम : सरजी मैंने नई दिशा में एडमिशन के लिए पू

जा कि तो मेरा एडमिशन वहां हुआ नहीं ,फिर मैंने मूनलाईट स्कूल में दाखिला पाया तो वहां पर भी मैंने भगवान् जी से पूजा की ,पर मुझे फिर भी बहुत कम आता है !

बात खुद ही सही रास्ते पर गयी थी तो मेरे लिए समझाना आसान हो गया !
मैं बोला कि ,बेटा देखो एक बात सब समझो कि जब तक आप खुद की मदद नहीं करोगे तब तक भगवान् या खुदा से कितनी भी प्रार्थना कर लो ,वो आपको कोई मदद नहीं करेगा ! चाहे रीना हो ,सूबी या जांबांज सबने अपनी तरफ से मेहनत की और भगवान् या खुदा से प्रार्थना भी की 

इसलिए उनकी बात सुनी और उनकी इच्छा पूरी हुई ,जबकी पूनम केवल पूजा करती है घर पर खुद मेहनत नहीं करती ( इस बात का इल्म पूनम को स्वयं भी है ) तो इसीलिये उसकी पूजा को भगवान् नहीं सुनता है !

ऐसा आभास हुआ कि पूनम का बाल-मन शायद कुछ तो समझ सका है :) .
सोना की चुलबुलाहट से समझ रहा था कि कुछ है उसके भीतर जो कहना चाह्ती थी वो मगर किसी सोच में डुबी थी !
क्या हुआ सोना ?
सोना : सरजी आप पूजा करते हो ?
हाँ करता हूँ ना ,
आपने क्या मांगा भगवान् जी से ?
एक हल्की सी मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आयी,अब इन्सान होने के नाते भगवान् के सामने हाथ फैलाना तो जैसे हमारा धर्म होता है ,मगर मैं अपने लिए कम ही हाथ फैलाता हूँ ईश्वर के सामने ..खैर ..
जब भी तुम लोगों का एडमिशन का टेस्ट होता है तब मैं भी भगवान् जी से मांग लेता हूँ कि तुम सबका एडमिशन हो जाए और तुम सब आगे तक पढ़ते रहो ...बस यही ...

सोना : सरजी तो आप बस हमारे लिए ही मांगते हो अपने लिए ...
अपने लिए तो बहुत कुछ मांगते रहता हूँ ... बहुत लम्बी लिस्ट है ...
सोना : जैसे क्या मांगा आपने ..
चलो- ये सब छोड़ो अब पढाई करते हैं .. :)

क्रमश: ...

PS: नवम्बर २००९ की घटना  पर आधारित ..

पैसन ....

on Monday, January 25, 2010
पहला प्यार ??? सबको याद होगा कुछ न कुछ मुझे भी याद है भलीभांती !!
..स्कूल के दिन ,जल्दी पहुँचने की लालसा ! प्रेयर(प्रार्थना ) से पहले कुछ समय के लिए ही सही केवल दर्शन ही हो जाए बस यही एक विचार उस बाल मन को रोमांचित कर देता था ! करीब 4 -5 किमी. के पैदल यात्रा क बावजूद इतनी ऊर्जा रहती थी कि ग्राउंड में जाकर पूरी जी जान से खेल सकूं ! जी हाँ "क्रिकेट" मेरा पहला प्यार ! मैं शायद 8 - 9 साल का था और मुझे चाचा लोगों के बीच क्रिकेट से सम्बंधित गुफ्तगू में जो मजा आता था वो सोचकर अभी तक मन हर्षित हो जाता है ! वैसे हिन्दस्तानी होकर क्रिकेटर बनने का सपना कौन नहीं रखता है, इस से सस्ता सपना बिकता भी नहीं शायद :) ! मगर इसमें गलत क्या है ,हमें यानि किसी भी भारतीय को " और किस क्षेत्र का इस से ज्यादा एक्सपोजर मिलता है ? "  

    एक बात तो है कि क्रिकेट ग्राउंड के भीतर पहुंचते ही जैसे एक अद्धभुत सी स्फूर्ति पुरे दिलो-दिमाग और शरीर पर छा जाती थी ! मुझे सीनियर टीम  में आने की जल्दी थी और मेरे व्यक्तित्व में हमेशा ये रुख रहा कि किसी भी टीम में वो जगह लो, जहां सबसे ज्यादा काम करना पढ़ता हो और जहां सबसे ज्यादा महत्ता मिले :) .बैटिंग पर ध्यान दिया और विकेट कीपिंग के दस्ताने पहने ! सच में जो लगन थी इस गेम क लिए उसने जादू कर डाला ! बहुत जल्दी सीनियर टीम का सदस्य बन गया और इसी क्रम में एक दिन किसी लोकल टूर्नामेंट में खेलने वाली बड़ों की टीम में मेरा भी नाम आ गया ! 
             मैच से कुछ ३-४ दिन रोज से सपने भी क्रिकेट ग्राउंड के ही आने लगे ! मैं 11-12  साल की उम्र में बढों की टीम से पहली बार किसी टूर्नामेंट में खेलने वाला था ! कपिल देव को शायद तिरासी का वर्ल्ड कप जीतने के इतनी खुशी न हुई हो जितना में अपने इस मैच के लिए खुश था :) ! इससे पहले एक बात और जानने की है कि एक बार मेरे बड़े भाई ने एक जूनियर टूर्नामेंट में खेलने वाली टीम से मेरा और मेरे चचेरे भाई का नाम आख़िरी समय पर  केवल इसलिए कटवा दिया था, क्योंकी 11 की टीम में 4 लोग हमारे ही परिवार से हो रहे थे ! करीब डेढ़ घंटे की मैराथन दौड़ने  के बाद जब हम क्रिकेट ग्राउंड पर पहुंचे तो बहुत रोये पुरे मैच में रोये ,और मन ही मन ये भी प्रार्थना करते रहे कि भगवान् मेरे भाई कि टीम(जो कि इस मैच से पहले मेरी भी थी) हार जाय और हुआ भी ऐसा ही :) ! 
               2 दिन बचे थे सीनियर टूर्नामेंट के और एक दुर्घटना घटी ,शायद मेरी व्याकुल "उत्सुकता" को ये सबक सिखाया गया था कि "जमीन पर रहो बेटा " ! राह चलते हुए मुझे किसी पत्थर से ठोकर लगी और मेरी चप्पल जा निकली और शायद पिछली रात के किसी "देवदास" द्वारा तोडी गयी बोतल के कांच को मेरे पैर के नीचे आने का बहाना मिल गया ! घाव गहरा था ,खून बह रहा था ,दर्द इस बात का ज्यादा था कि परसों मेरा मैच है और मुझे विकेट कीपिंग करनी हैं ! मनुष्य की आख़िरी शरण ईश्वर ही होता है चाहे कोई अपने को आस्तिक कहे या नास्तिक ! "दीवार " के अमिताभ को भी आखिरकार जाना ही पडा था मंदिर में और उसकी ही परिणिती है कि हर भारतीय के पर मुख जाने-अनजाने ये डायलाग आ ही जाता है  "खुश तो बहुत होगे तुम आज :) " ! मैंने भी प्रार्थना की,कि भगवान् 2 दिन में घाव ठीक कर दे ! मगर ऐसा होना कहाँ था !  प्रकृति अजेय है, मनुष्य कितनी भी कोशिश कर ले प्रकृति को हरा पाना न ही कभी संभव था न ही कभी होगा !  पर निष्ठा और लगन में मैंने कमी न होने दी और पैर पर पट्टी बंधे हुए और "पेन किलर" लेकर ही वह मैच खेला !जिसके बाद घाव ऐसा बिखरा कि हफ्ते भर के लिए लंगडी टांग(एक पैर पर चलना) करते हुए सारे दिन निकाले गये ! २ दिन तक तो बहुत ज्यादा बुखार रहा ! घर पर मरहम और प्यार तो मिला मगर बहुत डांट भी पडी ! मगर प्यार तो प्यार है उसमें छोटे मोटे गम क्या मायने रखते हैं ?

क्रिकेट और उसका जूनून ही था क्लास 3rd या 4th में सुबह के 3 बजे उठकर ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के 92 का वर्ल्ड कप के मैच देखने बैठ जाता था !सर्दियों की छुट्टियों में सुबह 8 बजे ग्राउंड में पहुँच जाते थे और कम से कम 3 मैच जरूर खेले जाते थे ! शाम के 5 बजे तक हालत यह होती थी कि खुद के शरीर को ढोना भारी पढता था मगर खेल का जूनून कम न होता !शरीर एक अजीब सी थकावट महसूस करता था मगर दिमाग का ये सिग्नल समझ नहीं पाता था कि "भूख काफी जोर से लगी हुई है " !
      
          बाद में स्कूल से कालेज और कालेज से आफिस ये क्रिकेट प्रेम का सिलसिला कभी थमा नहीं ! वैसे सच कहूं तो स्पोर्ट्स एक ऐसे विधा है जो संगीत की ही तरह विशुद्ध है ! ग्राऊंड के अन्दर पहुँचते ही जिस किस्म का फोकस और लगन होती हैं वो शायद कभी भी नहीं,कहीं भी नहीं होती ! भाग्यशाली हूँ की ऐसी जगह काम करता हूँ जहां स्पोर्ट्स को बहुत महत्ता मिलती हैं राष्ट्रीय टेनिस टूर्नामेंट को मेरी ही company करवाती है तो साल में एक क्रिकेट टूर्नामेंट जरूर होता है ! पिछले 3 वर्षों से हमारी ही टीम फाईनल जीतेते आ रही है !  मैंने विकेट कीपर के दास्ताने कब के त्याग दिए और पिछले साल पूरी टूर्नामेंट का बेस्ट फिल्डर का आवार्ड "पॉइंट" की फिल्डिंग करके लिया ! इस वर्ष के पहले ही मैच में दायीं ओर कूंद  मारते  ही दांया कंधा तुड़वा लिया और दूसरे मैच में टूटे कंधे से ही खेला और फिर दुर्भाग्य से बांया कंधा तुड़वा लिया ! मेरी टीम फाईनल तक भी नहीं पहुँच पायी मेरा फिट न होना भी एक बड़ा कारण बना ! दिल टूटना जायज था ! मगर प्यार तो प्यार होता है ! 

लेकिन ये क्या हुआ ,मेरे ऑफिस की मेल में मुझे टॉप 14 खिलाड़ियों में चुना गया था जो के "Turf Management  Tournament " में कंपनी की टीम में खेलेंगे ! मेरे आफिस से 3 खिलाड़ी और थे ! शनिवार के सुबह प्रेक्टिस सेसन तय था और मुझे काफी सारे  मिस्काल  आये हुए थे ! मूड काफी खराब था ,काफी सोचने के बाद निर्णय लिया कि फिटनेस जरूरी है ! दोनों कंधे अभी भी दर्द कर रहे हैं ! सो एक SMS ही करना था और वो कुछ इस किस्म का था  " due to fitness problem  I  will  not participate in inter corporate cricket tournament :( " .

और इसके साथ ही दिल टूट गया :( .....

मुफ्त की सलाह :- "जिन्दगी की खुशहाली और जिन्दादिली के लिए पागलपन की श्रेणी  के Passions और दिल के  गहराइयों में उतर सकने वाले Relations होना उतना ही जरूरी है,जितना कि जीने के लिए हवा ! " 

"जज्बा" ..

on Sunday, December 6, 2009


कुछ मन है ,कुछ तो बात है जो कचोट रही है ! मुझे पता है आप में से कुछ गूगल महाराज की मदद से चैटिंग कर रहे हो ,कुछ अपने फेसबुक स्टेटस बदल कर अपनी दिल की भावना व्यक्त कर रहे हो या फिर कुछ अपने आफिस के कंप्यूटर को "कोड" रूपी घास फूस खिला कर आई. टी. वर्ल्ड का उत्थान कर रहे हैं ! इन सब महान कार्यों में खलल के लिए माफी चाहता हूँ !खलल कैसा ? मतलब कि मैं आपसे कहूंगा कि कुछ इस "लेख" को भी पढो और खुद को अभिव्यक्त करो "कमेन्ट " के रूप में ! मगर शायद बात गहरी है तो लिखना ही पडेगा !

एक बात है जो कल से कचोट रही है तो सोचा आपके साथ बाटूँ ! किसी बात से ध्यान आया या सच कहूं तो मैं आपको बताउंगा कि ध्यान किस बात से आया ! ध्यान आया कि कुछ ऐसे भी होंगे जो देश की
रक्षा में सियाचिन की ठण्ड में प्रहरी बने अपना काम बखूबी निभा रहे होंगे ! जिनको हम लोग केवल उस वक़्त याद रख पाते हैं जब सीमा विवाद की वजह से कोई भीषण युद्ध हो या कोई आतंकवादी हमला ! वैसे ये उनकी जरूरत नहीं है कि हम उनको याद रखें मगर फिर भी पता नहीं क्यों हम सबको किसी न किसी तरह से इनकी
"दिनचर्या " की केवल जानकारी ही हो तो शायद हम "कृतज्ञ" महसूस करें इन सैनिको के लिए ! भारतीय
सेना के लिए !

मैं कालेज में था अचानक से एक दिन मेरे चचरे भाई की चिठ्ठी आयी अंतर्देशीय पत्र
के द्वारा ! वो भारतीय सेना में सैनिक है ! और उस समय सियाचिन पर पोस्टेड था ! चिठ्ठी के कुछ अंश इस
प्रकार थे !
" भाई आक्सीजन की कमी की वजह से खाना तो खा नहीं पाते हैं मगर फिर भी कोशिश करते हैं की दिन भर में एक दो रोटी खा सकें !हर जवान को हर दिन का करीब 8 लीटर कैरोसीन तेल मिलता है और ठण्ड का आलाम ये है की कैरोसीन स्टोव से एक मिनट के लिए भी खुद को दूर नहीं रख सकते हैं ! शून्य से भी नीचे तापमान है ! तीन दिन में एक हिन्दी अखबार आता है और मनोरंजन के नाम पर यही एक सहारा है ! अगले तीन दिनों तक उस अखबार को तब तक पढ़ा जाता है जब तक की शेयर बाजार वाले उस पेज तक को न पढ़ डालें जिसमें खबरें होती है की "दाल टूटा ,सोना उछला ,चीनी मंद और चांदी चमकी " ! बदन पर अभी तक वही कपडे हैं जो 40 दिन पहले यहाँ आते वक़्त पहने थे ! हरी ड्रेस, कैरोसीन के धुंए से काली हो चुकी है ! और चेहरा खुद को पहचान में आन लायाक नहीं ! 25 -30 दिन में एक बार नहाने का सोचते हैं बर्फ को 100 डिग्री तक उबाला जाता है और नहाने के वक़्त 4-5 स्टोव चारो तरफ रख दिए जाते हैं मगर फिर भी ये आलम होता है कि आख़री जग पानी बर्फ में परिवर्तित हो चुकी होती है ! "
ऐसी कई बातें उसमे थी जो कि हम और आप जैसे मानुष के मस्तिष्क के सोच के दायरे से काफी आगे थी ! मैं उस चिट्ठी को लेकर पूरे हॉस्टल में घूमा था और एक -एक सहपाठी को पढ़ाने का प्रयत्न किया ताकि वो लोग उस कठिनाई को कम से कम समझ तो सकें !
दूसरा वाक्या तब का है जब भाई की शादी के ठीक 15 दिन पहले उसका फोन आया ! मेरा भाई भारतीय सेना की "राष्ट्रीय रायफल " में पोस्टेड था उन दिनों ! वो बोला "यार मम्मी-पापा को मत बताना मगर कल रात एक आतंकवादी मुठभेड़ हुई ,रात भर गोलियां चली , और मेरे साथ के 3 -4 जवान शहीद हो गये ! और हम-सब साथ ही गोलीबारी में डटकर सामना कर रहे थे मगर ... " मैं काफी समय तक सोच में डूबा रहा उस बातचीत के बाद , भयावह सोच में !
कल शाम सेक्टर 18 के बरिश्ता में बैठे हुए थोड़ा समय था तो सोचा गाँव में बात करूँ ! सबसे बात करने के पश्चात ताऊजी से बात हुई तो बोले "तुझे खबर है, वो जो पड़ोस में चाचा जी हैं लखनऊ वाले उनका बेटा था ना "मेजर भूपेन्द्र मेहरा" वो आतंकी हमले में शहीद हो गया! कुल मिलाकर ४ लोग शहीद हुए हैं ! " क्या कहता और क्या प्रतिक्रया देता ! लग रहा था जैसे मस्तिष्क और हृदय सुन्न हो गया है ,जैसे सोच का दायरा भी ख़त्म हो चुका है ! ऐसा नहीं है कि जीवन में इस मेजर के पास कुछ और(यानी इंजीनियर/डॉक्टर/वकील या कुछ भी) करने के विकल्प उपलब्ध नहीं थे मगर वो उसका "जज्बा " ही था जो उसे भारतीय सेना से जोड़ पाया !


मैं न तो इस लेख से कोई सारांश निकालना चाहता हूँ न ही मेरे लेख से भारतीय सेना के "पराक्रम,साहस व बलिदान " भरी बरसों पुरानी गाथा को कोई बल मिलने वाला है ! मगर मैं जो महसूस करने कि कोशिश कर रहा हूँ वो अभिव्यक्त कर पाना नामुमकिन है ! बस इतनी इल्तजा आपसे भी है , कि हम सब अगर केवल अपनी कृतज्ञता ही जाहिर कर सकें इन बलिदानों के लिए तो शायद उस परिवार के दर्द को थोड़ा महसूस कर पायें जिसने एक 4 महीने के बच्ची के पिता को राष्ट्र के लिए खो दिया !

जय हिंद !!


Darshan Mehra
darshanmehra@gmail.com
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