सूकून के वो दिन !!!!!!!

on Thursday, September 13, 2007



लिखना मुझे पसन्द है क्योंकि मुझे अपने बारे मैं गलत फहमी है कि “मैं ठीक ठाक लिख लेता हूँ ” कई बार लिख्नना बहुत संतोष देता है,
क्योंकि वो कलमबद्ध की हुई बात बाद मैं आपको उस् पल को दुबारा जीने का मौका देती है.

त्यागी (अंकित त्यागी ) और मेरा nature एक मामले मैं एक जैसा है! वो है हम दोनो को घुमना बहुत पसन्द है. और इसकी ही परीणिती थी की हम दोनो बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा पर गये. और मेरे हिसाब से ये यात्रा अपने आप मैं एक बहुत ही सफल यात्रा थी! Office से सोमवार मंगलवार की छुटी ली और उसमे शनिवार और रविवार का सप्ताहंत मिला कर 4 दिन की छुटीयॉ बन गयी !
4 मई 2007 :-

दिन मैं 6 महिने का review देने क बाद , 8 बजे रात को मैं घ्रर पहुचॉ . त्यागी पह्नले ही वहॉ पहुंच चुका था ! रात के 10 बजे अंतत: हमारी यात्रा शुरू हुई! जाते ही आनन्द विहार से A/C कोच बस मिल गयी. बस के साथ एक surprise मिला वो ये की Rambo भाई भी बस मैं ही थे ! Rambo ऋषिकेश अपने घर जा रहे थे , जबकी उसने दिन में मुझे कहाँ था की वो ऋषिकेश से बोल रहा है! फिर से एक मजकिया झूठ, जो मुझे हमेशा की तरह फिर पसन्द नही आया, खैर जैसे ही बस चली मैने त्यागी से बोला “देखना ये TRIP बहुत मस्त रहेगी.” जो बाद मैं सच साबित हुआ " !!!!

5 मई 2007 :-


सुबह 3:45 बजे हुम लोग ह्ररिद्वार/हरद्वार पहुँचे .इस शहर से मैं अपने इंजीनियरीइंग के दिनो से जुडा हुआ हूँ ! और हमेशा सोचता था कि इस् शहर को कोई ह्ररिद्वार (Haridwar) और कोई हरद्वार(Hardwar) क्यूँ कहते हैं , इस बार यह बात पता चली कि असल मैं इसके दोनों ही नाम हैं ! ये तीर्थ–स्थान् बद्रिनाथ (बद्री यानि विष्णु यानि हरी ) और केदारनाथ (क़ेदार यानि शिव यानि हर) को जाने का द्वार है ! कालेज के एक junior ने हमको बताया की बद्रिनाथ की बस यहीं से मिल जायेगी . 4:30 बजे हम लोग GMOU Ltd की बस से चल पडे बद्रिनाथ के लिये ! थकान और नींद से हाल बेहाल था , लेकिन ऋषिकेश में गंगा जी के किनारे-2 जब गाडी चल रही थी तो आंखो में दर्द तो हो रहा था नींद के मारे, पर इतना खूबसुरत नज़ारा देख कर सोने का मन नहीं कर रहा था ! देवप्रयाग पर गाडी रूकी , पहला नज़ारा ही हिन्दी फिल्म “ किसना “ की याद् दिलाने वाला था ! देवभूमी

उतराखण्ड के पांच प्रयाग में से एक ! बहुत ही मनोहारी द्र्श्य था ! इसके अलावा ये जगह आलू के पराठों के लिये भी मशहूर है!
सृपाकार सड्कों से गुजरते हुए 1:30 बजे दिन में हम चमोली पहुँचे ! भूख अपनी चरम पर थी, आलू-प्याज के पराठें, दही ,अचार् इतने लजीज शायद ही कभी लगे ! अब तक बस का सफर करते हुए लगभग 16 घंटे हो चुके थे ! हम बहुत बुरी तरह से थक चुके थे, और कंड्क्टर ने बताया कि अभी भी 4-5 घंटे और बचे हैं बद्रिनाथ पहुँचने में !!!
आगे का रास्ता और भी घुमावदार , आखिरकार 4- 4:30 बजे हम जोशीमठ पहुँचे और वहाँ पता चला कि जोशीमठ से बद्रिनाथ दोनों तरफ एक साथ ट्रेफिक नही चल सकता इसलिये हमको 5:30 बजे तक इंतजार करना पडेगा ! इस बीच हम दोनों भगवान नरसिंह के मन्दिर में दर्शन करके अपनी तीर्थ यात्रा का आगाज़ कर चुके थे !
1:30 घंटे के इंतज़ार के बाद सुहाने मौसम में हम लोग जोशीमठ से बद्रिनाथ के लिये चल पडे ! हल्की-2 सी बारिश के बीच करीब 1-1:30 घंटे में हम आखिरकार बद्रिनाथ पहुँचे ! रास्ते में ही बर्फ से ढ्के पर्वत श्रंखलायें दिखने लगी थी ! इतने करीब से बर्फ के पर्वत मैने पहले नही देखे थे, जबकी मेरे घर से यानि रानीखेत से हिमालय काफी करीब नज़र आता है!
बद्रिनाथ पहुँच के ठंड अपनी पराकाष्ठा पर थी ! दिल्ली से सोचा भी नही जा सकता था कि इतनी ठंड होगी वहाँ , एक छोटे से होटल में रूम लेकर हम लोग यानि मैं और त्यागी उस ठंड में निकल पडे टहलने !
20 घंटे की बस की यात्रा करने के बाद थकान से पुरा शरीर टूट रहा था, इसलिये रात को 9:30-10 बजे सो गये !!!!



6 मई 2007 :-


ये सोचकर की अलार्म से 4:30 बजे उठ जायेंगे ! मगर 5:30 बजे उठे ,खिड्की से बाहर का नजारा इतना सुन्दर था कि बयाँ कर पाना मुश्किल है ! बर्फ आछादित, नर – नील पर्वतों पर सूरज की किरणें पड रही थी, उठ्ते ही त्यागी इस् द्र्श्य को कैद करने में मशगूल हो गया कैमरे के साथ ! इतनी खुशनुमा सुबह के साथ दिन तो सुन्दर होना ही था !
कडाके की सर्दी थी बाहर, किसी तरह मैं और त्यागी तप्तकुंड तक पहँचे,गर्म पानी का कुन्ड !!! इतना गर्म की लग रहा था की जल जायेंगे ! पहले 3-4 मिनट तो बहुत गर्म लगा पानी लेकिन बाद में आनंद आ गया, सारी सर्दी खत्म हो गयी और मजा आ गया समझ लो , हा हा हा !! बद्रीनाथ के प्रांगढ् में पहुँच कर याद आया कि कैमरा लाना भूल गये थे , सो वहाँ के एक कैमरामैन से फोटो खिंचँवाया, और भगवान के दर्शन किये, एक अलग ही माहौल था मन्दिर में ! चित प्रसन्न हो गया, कुछ अपनी मनोकामनायें मांगी और कुछ लोगों की !!!
बद्रीनाथ से सीधे “माना” गाँव के लिये चल पडे पैदल ही ,3-4 कि.मी. की दूरी पर यह आखिरी गाँव् है भारत सीमा का !
इस गाँव से ही विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी का उदगम होता है ! साफ , निर्मल, पवित्र और नीले रंग की यह नदी करीब 100 मी. आगे जाकर भगीरथी नदी में समा जाती है ! इतना स्वच्छ जल शायद ही कहीं आप देख सकते हो !


अब हम चल पडे सबसे मुश्किल चढाई पर “वासु की धारा” !!
5.5 कि.मी. की चडाई वो भी समुद्र तल से 4000 मी. की उचाँई पर, उपर से एक और गलती कर दी हम ने, हमारे पास ना पानी था न खाना! शायद हम दोनों ही शुरुआत कर रहे थे इस कठिन चढाई को चढ्ने की ! हम लोग चारों तरफ से बर्फ से ढके हुए पहाडों से घिरे हुए थे ! और लग रहा था की हिमालय को छुने की कोशिश है ये ! धीरे-2 जब हमने चढना शुरू किया तो थकान लगनी भी शुरु हुई , और जब साथ में त्यागी हो वो भी Woodland के 2-2 Kg. का एक जुता पहने हुए तो सोचो क्या हाल होना था J !
रास्ते में वासु की धारा के करीबी जगह नज़र आ रही थी ! बस ये पता चल रहा था की आज तो हिमालय (हिम+ आलय) में पहुँच के रहेंगे ! पर त्यागी की हालत थोडी खराब होना शुरु हो गयी थी, और हमारे पास पानी तक नही था, पुरे रास्ते में हमको केवल एक Spain की महिला नज़र आयी और उसके पास भी पानी खत्म हो गया था ! रास्ते के बायीं तरफ बर्फ की नदी बह रही थी, और बर्फ के समन्दर से हम लोग केवल 100-200 मी. दूर थे ! त्यागी की रफ्तार कम देख कर मैंने उसे छोडा और अकेले ही चल पडा, अभी भी 1 किमी. का रास्ता बचा हुआ था और मेरी हालत भी थकान से खराब होने लगी,उपर से साँस लेने में भी बढी दिक्कत आ रही थी ! त्यागी कम से कम 1 किमी. की दूरी पर होगा मुझसे , आखिरी दूरी है यह सोच कर मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी , आखिरकार “वासु-धारा” दिखने लगा मुझे !
इतना सुन्दर द्र्श्य !!! एक सफेद गददे के समान बर्फ से ढकी हुई घाटी, और उपर से गिरता हुआ जल- प्रपात, करीब 500-600 मी. की उचाँई से गिरता हुआ बर्फ का बिल्कुल सफेद पानी का झरना, यही था “वासु-धारा’’, एक छोटा सा मन्दिर था वहाँ पर, माता का मन्दिर , छोटी सी मूर्ती लगी थी, उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे माता मुझे एकटक देखी जा रही हो !

बडी हिम्मत करके मैं बर्फ में चलते हुए वासु की धारा के करीब पहुँचा, डर भी लग रहा था चूँकि मैं अकेला था इस विरान जगह पर, और बर्फ धंस भी सकती थी, और त्यागी अभी तक नहीं पहुँचा था ! मैंने अपने लेदर का जैकट उतारा, और बर्फ में बिछा कर उस पर बैठ गया , मुझे महसूस हो रहा था कि इससे सुन्दर स्वर्ग भी नही हो सकता शायद ! चारों तरफ से बर्फ के पर्वत, बीच में बर्फ की नदी, उपर से गिरता हुआ जल-प्रपात, और इस मनोहारी द्र्श्य का आनंद लेता हुआ मैं , अकेला बर्फ के गददे के उपर लेटा हुआ ! एक प्राणी और नजर आया मुझे,एक अकेला बन्दर ! जो उस सुनसान जगह पर बहुत अच्छा लग रहा था ! करीब आधे घंटे बाद थका-हारा हुआ त्यागी पहुँचा, उसकी थकान से हालत खराब थी और उपर से उसके 2-2 Kg के जुतों ने पैर पर घाव कर दिया था ! बडी हिम्मत करके वो उपर वासु की धारा पर पहुँचा, हम दोनों एकदम करीब गये, बहुत ही ठंडा पानी था वहाँ ,और बहुत ही गहरी खाई थी ! हम लोग ठंड से अकड रहे थे लेकिन थकान और प्यास अपने चरम पर थी ! आखिरकार हम लोगों ने बर्फ खाकर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करी ! बर्फ पर थोडी देर आराम करने के बाद, स्केटिंग करते हुए नीचे उतरे ! अब फिर से 5.5 किमी. का पैदल रास्ता लेकिन इस् बार नीचे जाना था !




त्यागी के जूते बदल कर मैंने पहने और करीब 1-1.5 घंटे में नीचे पहुँच गये,भूख और प्यास क1 निदान करके माना से चल पडे फिर बद्रीनाथ के लिये, हम लोगों ने सोचा था कि आज ही केदारनाथ के लिये रवाना हो जायेंगे, लेकिन भूखहडताल छूट चूकी थी :) !! भूखहडताल उस बस का नाम है जो बद्रीनाथ और केदारनाथ के बीच चलती है ! लोगों ने किसी समय इस बस सेवा को बन्द करने के विरोध में भूख हडताल की थी तब से इस बस का नाम भूखहडताल पड गया !!
माना से हम लोग काफी लेट हो चुके थे, भूखहडताल नही पकड पाये ! इसलिये हमने लंच करने के बाद जोशीमठ के लिये प्रश्थान किया, काफी मशक्कत करने के बावजूद हमें जोशीमठ से आगे के लिये बस नहीं मिली ! रात जोशीमठ में ही बितायी !



7 मई 2007

सुबह तडके ही चल पडे केदारनाथ के लिये, एक सज्जन ने हमें रुद्रप्रयाग तक छोड दिया, लंच करके चल पडें अपने अगले पडाव की ओर ! कई सारी गाडियाँ बदल कर, फिर से लगभग 250 किमी. का सफर तय करके हम 3.30 बजे गौरीकुंड पहुँचे ! गौरीकुंड से 14 कि.मी. की चढाई और वो भी इतनी ऊँचाई पर, केदारनाथ जाने का रास्ता बहुत खराब है , क्योंकि घोडे साथ-2 चलते हैं और रास्ते की सफाई का कोई इंतजाम नहीं है ! धीरे-2 मैं और त्यागी 1-1 कि.मी. पर रुक-2 कर चलते गये ! मौसम बहुत ही सुहाना था , दायीं ओर मन्दाकिनी नदी का प्रवाह मधुर था, सफेद झाग सा पानी पुरी निष्छलता से प्रवाहित हो रहा था ! और सामने के पहाडों पर बादल घने जंगलों के साथ ऐसे लग रहे थे जैसे कोई क्रीडा में मस्त हों !
रामबाडा अभी 2-3 कि.मी. दूर था, और घनघोर वर्षा शूरू हो गयी, रास्ते के किनारे एक सराय में रूकना पडा ! आधे-एक घंटे तक जब वर्षा नही रूकी तो हमने रू 20-20 की बरसाती खरीदी और चल पडे रामबाडा की ओर ! रामबाडा ठीक आधे रास्ते में पडता है केदारनाथ के ! करीब 7 बजे हम रामबाडा पहुँचे ! अंधेरा हो चुका था और रामबाडा पर होटल भी उपलब्ध थे मगर हमको दूसरे दिन लौट्ना था ताकि तीसरे दिन आफिस आ सकें !
तो हमने निर्णय लिया कि रात को ही केदारनाथ् पहुँचते हैं ताकि सुबह-2 दर्शन करके वापस दिल्ली के लिये चल सकें ! 7:30 बजे हमने चढाई शूरू की, रामबाडा से एक टार्च किराये पर ले लिया और इसके सहारे ही हम दोनों चल पडे , पहले-2 कुछ घोडे वाले वापस आते हुए रास्ते में मिले जा रहे थे लेकिन बाद में तो वो भी दिखने बन्द हो गये,
हम दोनों के लिये वो गीत सूट कर रहा था भूपिन्दर ने गाया है ,


                                                   “दो अकेले इस जंगल में, रात में दोपहर में !!,



                                                     आबोदाना ढूढँते हैं , आशियाना ढूढँते हैं !!!!



थकान और भूख से जान निकल रही थी, और शायद इतनी थकान पहले कभी नही लगी थी , आखिरकार गिरते – मरते हम 11:00 -11:30 बजे केदारनाथ पहुँच गये ! इतनी रात को हमको होटल मिलना मुश्किल था , हम लोगों ने कई दरवाजे खट्खटाये मगर सारे होटल भरे पडे थे ! हमारे उपर थकान इतनी हावी थी की भूख-प्यास तो जैसे भूल गये थे ! मेरे लिये पूरी यात्रा का सबसे यादगार पल वो था जब ठीक रात के 12:00 बजे हम होटल की तलाश में क़ेदारनाथ मन्दिर के प्रागंण में पहुँच गये !
एक पल के लिये तो मैं सन्न रह गया , मुझे ऐसा लगा जैसे भगवान के सच में दर्शन हो गये ! इतना खूबसूरत लग रहा था भगवान केदार जी का मन्दिर जो मेरे लिये अवर्णनीय है
 !
       शायद प्रभु की ही कृपा थी की उस भले मनुष्य ने एक गोदाम में रहने की व्यव्स्था कर दी, थकान के कारण,बिस्तर में ऐसा लग रहा था जैसे इतना आरामदायक बिस्तर कभी मिला ही न हो !

8 मई 2007
       सुबह किसी तरह स्नान की व्यव्स्था होने के बाद हम केदारनाथ जी के दर्शन के लिये पंक्ति में लगे ! मुझे इस स्थान की प्राकृतिक छ्टा को देख कर बार -2 ये लग रहा था कि भगवान को अपना निवास स्थान के लिये इससे ज्यादा उपयुक्त जगह मिलना शायद मुमकिन नहीं था ! मन्दिर के ठीक पीछे बर्फ का पहाड वो भी गगनचुम्भी उँचाई तक, ऐसा लगता है मानो ईश्वर का मुकुट धरा से स्वर्ग तक छूँ रहा हो ! दो – ढाई घंटे के बाद हमारे दर्शन हुए ! बडी रोचक कथा है केदारनाथ जी की ! महीषी भैंस के पिछ्ले हिस्से की पूजा होती है यहाँ ! मन्दिर के अन्दर आप चाहो या ना चाहो आप भगवान के रंग मे रंग ही जाओगे ! लोगों की आस्था देख मन गदगद हो जाता है !
11:30 बजे हम चल पडे अपनी यात्रा के समापन की ओर यानि वापसी पर ! फिर से 14 किमी. की पैदल यात्रा और शरीर की ऊर्जा काफी कम हो चुकी थी , पिछ्ले कुछ दिनों की मेहनत से ! मूसलाधार बारीश् ने काफी बाधा डाली और आखिरकार हम 3:30 बजे गौरीकुंड पहुँचे !
शाम के 7:30 बजे हम लोग रूद्रप्रयाग पहुँचे , रास्ते में गाडी से आते वक्त चेन्नई उच्च न्यायालय के एक वकील से बात हो गई ! हिन्दू धार्मिक ग्रंथावली का काफी अच्छा ज्ञान था उन्हें !
चूँकि अगले दिन आँफिस आना था हमें और गाडीयाँ चलती नहीं रात को गढवाल में तो हमने निर्णय लिया की ट्र्क ही सही पर वापस आना ही है उसी दिन , कुछ झूठ बोल कर अन्दर के सिगरेट के धुऐं से बचने के लिये हम दोनों ट्रक के छ्त पर चले गये ! ये एक अनोखा अनुभव था , रात को पहाडों की घुमवदार् सड्क पर ट्र्क के छ्त पर सोये हुए कभी एक तरफ लुढकते थे तो कभी दूसरी तरफ ! और थकान इतनी हावी थी कि ट्र्क के छ्त पर भी नींद आ गयी !

9 मई 2007

सुबह 3 बजे जब हरिद्वार/ हरद्वार पहुँचे तब आँखें खुली ! चूँकि मुझे सुबह् आँफिस आना था इसलिये तुरंत गाडी में बैठे दिल्ली के लिये ! पर यहाँ भी संघर्ष करना था, मेरठ रूट बन्द था ! पता नहीं किस-2 रास्ते से लाया ड्राईवर गाडी को , और ये हो ना सका कि मैं दिल्ली समय से पहुँच कर आँफिस आ पाया ! छुट्टी लेनी पडी ! ठीक 11:30 बजे मैं नोयडा पहुँचा घर पर !
अगर सारांश निकाला जाय तो मैं यही कहुंगा कि “ शारीरिक थकान भरी इस यात्रा में एक-एक पल भरपूर आनंदायक था, और अगर सही देवभूमी देखनी हो तो केदारनाथ दर्शन सर्वोतम है ”
मैं ये कहना चाहुंगा कि शायद मैं ये सबकुछ लिखता नही, पर त्यागी को यात्रा के दौरान वचन दिया था मैंने, और वो मुझे निरंतर याद दिलाता रहा और आखिरकार ये खत्म हो ही गया .....
इति !!!

नोट :- कृपया भाषा की त्रुटियों पर ध्यान न दें ,कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखना अपने आप में जंग जीतने जैसा है !!!



Darshan Mehra
darshanmehra@gmail.com

PS: your feedback always motivates to write better ,so give it now on COMMENT section :)








25 comments:

harish said...

Daju really mai bahut accha hai.
kafi acche se describe bhi kiya tune sayad isse adhik enjoy kiya hoga.
mai tou ye soch raha hoon ki is yatra mai mai kyon nahi tha.......
ya sayad meri kismat mai itne acche din nahi likhe hain......
no prob hope u will be continue this type of trip in future.
all the best.

Ankur said...

great............as if I were reading a bestseller. Darshan has made this description very interesting.........and is really the best person to contact if somebody has to go for the trip.
But hats off to this guy........who's has completed this repertoire in Hindi!!
really, writing in Devnagri is alike to winning a battle.
Nice trip u'd, nice story we'd.
Hope someday........we can plan a trip with Darshan and Ankit..........with full preparation and all the gears loaded.
what say guys??

Pratik Dixit said...

This splended describption of your trip of Badrinath and Kedarnaath --shows that you are blessed with devine blessins of GOD .

I can fell it because i was also the part of such trip in my childhood at the age of 13 in 1990 .

I had reminded the every moment which i feel during mr journey - those cool Ice blogs , those alloo parantahss, and kali dal ki kechdee which we had perepared there at badrinath.

----At last i feel that we will have some journy with each other in near future???????

PratikDixit ---ray of hope

Shweta said...

hey it vs reallllyyy guddd
dude u really do a gud work...dat is shown every whre...

hindi 2 tough 4 me but still i tryed ..really u did a gud job...



hats off to u buddy...

sandeep said...

Nice experince.

sandeep said...

Dharshan this is nice story. ( Whatever u r written in hindi languagu.). There are few pepole like u. who r his own Daily dairy Publish in this type. Such a good Effort.Please keep continue your Dharmin Expierence.

Thanks
Sandeep jha
9911096831

siddharth said...

good going Daju..
Bahut achha describe kiya hai trip ko...i was able to visualize each and every scene just based on your fantastic description.. :)
Keep it up..!!

PRANAV WAILA said...

when we will go to kedar and badri. It seems it was a reallu a great trip. if u have more photographs than share with us.. And continue writing.. You can do better..

Harshvardhan said...

darshan maja aa gaya acha likha hai lagta hai bahut maja liy a tune.

Kalindi Sharma said...

it is simply awesome and rocking ....infact to be very true u have helped me a lot in guiding me thru "how to make interesting Field Notes" which for me is a learning experience ....
but then why does he think he is not as good as any other writer..when on the contrary i think he is simply cut out for it...an upcoming author who has lots to promise with the readers :D
carry on the good work !! :)
kudos....

पंकज बसलियाल said...

सच कहूँ , जब तूने बताया था कि तू लिखेगा इस यात्रा के विषय में।
तो मुझे सच में ज्यादा उम्मीदें नहीं थी।
ईमानदारी से कह रहा हूँ, पहली बार तेरी लेखनी ने मुझे चमत्कृत कर दिया है। यकीन नहीं आ रहा अभी भी, कि मेरा दोस्त ऐसा भी लिख सकता है. निस्सन्देह बेहतरीन....

शब्दों में ज्यादा हेरा फ़ेरी ना करते हुये भी पूरे समय तक पाठक को बाँधे रख सकने की अद्भुत क्षमता थी पूरे विवरण में
जिसके लिये वाकई बधाई के पात्र हो तुम। आगे भी इस सिलसिले को जारी देखना चाहता हूँ.

sonal said...

Bass.....!!!!Ghoom lia Badrinath aur Kedarnath... :)

ashok said...

अति प्रभावशाली विवरण....

दाजू..आपके द्वारा लिखी गयी बदरीनाथ - केदारनाथ यात्रा का विवरण पड़ते हुआ मुझे एक पल तो ऐसा आभास हुआ की मानो में भी आप के साथ इस यात्रा में साथी था! अपकी इस यात्रा का विवरण काफी मनोरंजक था! मेरी आपसे ये गुजारिश है की आप आगामी भविष में भी मुझे अपनी रोचक यात्रा को पडने का आव्सर प्रदान करेंगे!

धन्यवाद
अशोक

Beagle said...

wow darshan- gr8 photographs and great 'yatra vivaran'. keep it up!

Beagle said...

darshan this is me, in case u were wondering!
Shruti

kavita said...

bhaiya sach me bahut ache se apne trip ko etane ache sabdo me piroya ha.shayad etna enjoy tumne bhi ni kiya hoha jitna mene ese pardh ke kiya hai,jab me ese pardh rhi thi esa lag rha tha k jaise me bhi es trip me gayi hu.
sach me its realy very good and
i think that u r a good writer.
my best wishes r always wid u

Divya Prakash said...

Humne mahabharat main suna tha ki koi hai jo yudha ka ankho dekha hal batata hai, socho esa nahi ho sakta ,lekin tv aaya aur hum sabka ankho dekha hal jan ne samnjhne lage,aaj yaha ye poast padh ke esa hi lag raha hai ki darshan ho gaye badrinath ke wo bhi darshan ke kalam ke se ..
maza aa gaya guru

ANKIT said...

Sorry Darshan bhai...yeh cheezzz mujhe bahut pehle kardeni chahiye thi lekin time na milne ki wajaah se mein likh nahin paya.. mein iske liye shamma maganta hun.....

waise iss trip ke baare mein kya lihoon darshan ke saath meri saari trip yaad gaar rehti hai...hum donno hi aise log hai jo humeesha kuch na kuch karke time nikal lete hai ...sirf apne liye....aur nikal padte hai ek naye raste pe...meri zidd par issne yeh likha jo ki unexpressable hai....darshan tune inna acha likha, laga ki mein phir se wahin pahuch gaya hun...sach mein woh jagah jannat thi...and that was the time mujhe laga mein kissi alag hi duniya mein aa gaya hun....duur se jiss himalaya ko dekhta tha unko mein choo sakta tha...ek alag hi anubhav mehsoos hua...

khass torr pe jab hum donno kedarnath ki chadhaii ki thi raat ko...kuch nahin dikh rah tha, hum donno ek doosre ka haath pakad ke rasta dhundh rahe the....mujhe nahin lagta ki koi bhi aisa karne ki himat kar sakta hai....shayad agar darshan mere saath nahin hota to mein woh sab nahin kar pata jo kara.....

uss time pe aisa tha ki hum sochte ki kassh aisa ho jayee aur woh ho jata tha....laute waqt bus ka nahin milna...office time se pahuchna,,,meerut ka route band hona,,,achanak ek truck ka milna....inn sab cheezzoo ko dekh kar lagta hai koi teesra bhi humare saath tha jo humari sabb parehsnaiyoo ko hal kar raha tha....shyad darshan mere saath tha isliye woh humari madad kar rah tha...verna meri kaun madad karta hai....

yehi sab soch kar mera doobara wahan jaana ka mann hai....aur mein yehi chaunga ki mein darshan ke saath hi jaoon....waise humein abhi kaffi jagah jana hai...yaad hai darshan...abhi gangotri aur yumnotri ki trip bhi bachchi hai...jiska hum soch ke ayee the ki jayenge....

in the end: With god blessings ... aage aur bhi aise trip lagte rahenge humare...aur mein ase hi issee zidd karta rahunga ki yeh likhe aur harr trip ek yaad gaar ban jaye...

In Serch of ...... said...

So its my turn again .. :)
.
.
It is an overwhelming response from the readers ,from you all my lovely frends ,
It will definately motivate me for my next story,I was just waiting for tyagi's (Ankit tyagi) comment for this story,as he was the part of this trip only ...
I expect you all will motivate me in future too ....

Luv u all :)
darshan

Neha said...

hi...Darshan,
its really gud...like a story....
n i will say grt exp. also......keep on putting dis type of exp.....it will enhance ur knowledge....hahaha...gud creative writing....

rohit.gupta said...

Darshan.. it is really very good description of ur journey..

After reading this i too felt of going on this trip in the near future..

all the best keep writing

Raj said...

Mujhe kuch kehne ke liye chodda hi nahi !! .. Great work :D

Shishir said...

very good, amazing...
maja aa gaya beedu...

Poonam said...

Hi,
thanks for this excellent description of your journey to such serene places.You actually take ppl at each site with u as they read on.
Good work.
TC

Sahil Pathania said...

Sir,

Well done,your Hindi is amazing. Keep it up. Good Stuff.

Post a Comment