" मेरे घर आना जिंदगी "

on Saturday, June 14, 2014
                      मैंने "श्रवण" को बोला कि एक और बीयर बनती है ,उसने मौन हामी भरी ,बीयर सर्व करते उस ऑस्ट्रेलियन युवा की तरफ मैने देखा ही था की वो बोल पड़ा " Do you need two mo ??"  मुझे कुछ शरारत सुझी "Hey man ,How did you know that ?? Even I have not said a single word " वो मुस्कुराया। .... मैं उसे फिर बोला " You know I am married " .. वो जोर से हंसते हुए बोला  … " Even I am not a gay " बीयर की ब्रांड का नाम था " Four Wives " अब वो शरारती लहजे में बोलता है की " Rather it should be "Two Wives" " .. हम तीनो ने जोर से ठहाका लगाया .... ​​

                               इसी सब में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए "श्रवण" बोला ,सरजी कई बार  तो लोग सुबह-२ खुद के पैसे मांगने आ जाते और पापा और हमारे पुरे परिवार को  खूब सारी  गालियां दे जाते थे  । कभी-२ हम लोग घर के बाहर ताला खुद ही लगवा देते थे  ।  करीब पिछले 12  सालों से उसके अंदर इतना "कष्ट " सहने ,उसको खुद में ही समेटने  और उससे लड़ने की इस  हिम्मत  का मैं तो कायल हो गया । वो मुझे "सरजी" कह कर ही पुकारता है जबकि वो मेरे ही स्कूल में मुझसे केवल  एक क्लास जुनियर था  बस । IT इंडस्ट्री की ही देन  है की हम दोनों ही आज सिडनी में स्कूल के बाद फिर मिले ! सरजी कभी-२ पुरे घर में खाने के लिए तक पैसे नहीं होते थे  । हमने कभी किसी का बुरा चाहा नहीं मगर  … 

                  सरजी, पापा का फाइनेंस का  बिजनेस था ,उनका  बिजनेस पार्टनर  इतनी बढी गबन करके फरार हो गया और हमको सड़क पर खड़ा कर दिया  … एक तो गरीब होता है जिसके पास कुछ भी नहीं होता मगर हमारे पास थे निगेटिव में 5 0-60   लाख  … किसी तरह से मेरे कॉलेज के लिए लोन सैंक्शन हुआ ।मैंने कालेज में ही सोच लिया था की अपनी  इंडिविजुअल  जिंदगी के बारे में तब सोचूंगा जब फैमिली के हालात ठीक  कर पाउँगा । मैंने ये सब आज तक किसी  को नहीं बताया  । हमेशा खुद को खुश रखने की  कोशिश करता रहा  । जब भी लो फील करता था पापा के बारे में सोच लेता था  । वो तो फ्रंट से ये लड़ाई लड़ते  रहे ,मैं तो सिपाही की तरह पीछे से सपोर्ट देता था बस  । आपको बताऊँ की  पापा को जेल तक जाना पड़ा  । "सरजी" पता नहीं क्यों आपसे "कनेक्ट" लगा मुझे वरना मेरे परिवार के अलावा ये सब मैंने किसी से शेयर नहीं किया आज तक  । मेरी मम्मी मुझसे बोलती रहती हैं की खुद के लिए भी कुछ कर लिया कर पिछले 7 -8  सालों में सिर्फ तुने हम सबके लिए किया है बस ! और मैं मम्मी को बोलता हूँ की "मैं सिर्फ एक जरिया हूँ ,करने वाला कहीं ऊपर बैठा है "  ।  "सरजी" मानवीय प्रयासों से ये सब हो पाना मुमकिन बिल्कुल नहीं था  ।  मैंने कभी किसी मैनेजर को नहीं बोला की मुझे onsite  भेजो ,कभी सोचा ही नहीं की ऐसा दिन आ पायेगा जब मेरा परिवार फिर खड़ा हो पायेगा   ।  "श्रवण" की आँखें चश्मे के पीछेे  नम थी  । 

                           
        मैं  बोला ईश्वर  सबकी मदद नहीं करता है शायद ,"You are a pure soul "  ,तुने  बिना संयम खोये ये लड़ाई लड़ी है बेस्वार्थ होकर ,इसीलिए ईश्वर तेरे साथ रहा हमेशा  । पर मेरा मन किया की उसको एक बार गले लगा लूँ फिर सोचा की जाते समय बोलूंगा  ।  फिर वो बोला पिछले 10 -12 सालों में अकेले मैं कितनी बार रोया हूँ याद तक नहीं है  ।  पिछले  साल मम्मी के गिरवी  गहने छुड़वाने वाले दिन मैं  कई घंटों तक रोता रहा  । मैं सोच में पड़ा रहा की मैंने ""श्रवण" को पिछले 10-12 सालों से जबसे मैं उसे जनता हूँ कभी दुखी नहीं देखा। । हमेशा हँसते हुए ,मुस्कुराते हुए  ,प्रयास के झुग्गी के बच्चों की फिकर करते हुए पाया   । जब भी हो पाता वो प्रयास के बच्चों के लिए डोनेट भी करता  … आज मुस्कुराते चेहरे के पीछे के दर्द को जाना ,संघर्ष को जाना तो "ईज्जत " कई सौ गुना बढ़  गयी मेरी नजरों में उसकी  । 
                           कह रहा था नवम्बर में कर्ज  का वो पहाड़ खत्म हो जाएगा ,फिर दोस्तों को बताऊंगा  । सरजी , मैं चाहता नहीं था की लोग मुझपे सिम्पैथी करें ,हमारी दोस्ती मेरे परिवार की हालात की वजह से बायज्ड हो  । फिल्मों में ऐसी कहानियां देखीं हैं काफी मगर ये तो असली "हीरो" बैठा था मेरे साथ  ।  मैं बहुत खुश था जो कुछ भी उसने हासिल किया था ,उसके लिए   जिस तरह से अडिग रहकर चुपचाप बिना किसी से शिकायत के वो संघर्ष किया है अतुलनीय है ये सब  । 

              मैं कुछ बोलता उससे पहले खुद ही बोला "सरजी " आपके  गले लगना चाहता हूँ एक बार    ।  वो अपने घर के लिए चला तो जा रहा था मगर मेरे स्मृतिपटल पर जितनी बड़ी छाप छोड़ के वो गया शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ हो  .... 

"और हम हैं की अभावों का रोना रोते हैं  ...." 

छू लूं आसमां ....

on Sunday, December 16, 2012

                                                                             जनवरी 2008 :(प्रयास नोएडा सेण्टर ) 

~ सरजी मैं बताऊ  ?
~ सोना तू रुक जा अभी बेटा ,सूबी ,सज्जाद ,जुलेखा ,साबरीन तुम सब बताओ
~ सर Q  फॉर क्वीन ... क्वीन मतलब रानी ..
सूबी ने जवाब दिया ...
~ सूबी  के अलावा किसी को नहीं पता क्या  ?? हद है एक ही बात  मैं कितनी बार पढ़ाऊंगा तुम सबको ??
~ सरजी अब तो मुझे बताने दो ना .. सोना बोली ..
सोना की नन्ही आँखों की चमक बता रही थी की उसे पता है ..
~ अच्छा बता सोना ? 
~ सर , Q फॉर क्वीन ,क्वीन मतलब रानी ,Q फॉर क्वील्ट ,क्वील्ट  मतलब रजाई .. और हाँ सरजी Q फॉर क्वेर्रल .. क्वेर्रल मतलब झगडना ....
~    कहाँ पढ़ा ये सब ???
~ सरजी आपने जो पाकिट डिक्शनरी दी थी .. उसी से पढ़ा ...

बता दूं की सोना नोयडा की झुग्गी के उन पांच बच्चों में से एक थी जिनको जनवरी से मार्च 2008 के उन तीन महीनों में  जीरो से क्लास 3 या अथवा क्लास 4 तक के लिऎ तैयार करने की जिम्मेवारी ली थी हमने .. ( विस्तार से पढने के लिए पढे "पितृत्व – एक यात्रा" ) ये बच्चे या तो  कूड़ा बीनते थे या कभी स्कूल नहीं  गए पहले ...कुछ गए भी तो सरकारी स्कूल में पत्थर चुनने में लगा दियी जाते थे ... 

मई  2011 : (प्रयास नोएडा सेण्टर ) 

~ सरजी ,आप बोलते थे ना की केवल अच्छे स्कूल में एडमिशन होने से कुछ नहीं होता ,जब तक की पांचवी पास न हो जाए सब बेकार है ...
~ हाँ तो ...
~ सरजी देखो अब मैंने पांचवी भी पास कर लिया और मेरा ओम फाउंडेशन में एडमिशन भी हो गया ..अब देखना मैं आपका नाम जरुर ऊँचा करूंगी ..
मन ही मन मैं खुश था ये सुनकर मगर एक अच्छे कोच की तरह अपने शिष्य को हमेशा धरातल पे रखने के एवज से बोला ..
~ देख सोना .. अच्छी बात है की तूझे एडमिशन मिल गया है .. पर असली पढाई तो अब है .. जब तक क्लास दसवी नहीं पास करती तब तक सब बेकार है ...
~ सरजी ..ये गलत बात है ..आप हर बार बढाते जाते हो ..दसवी पास जब हो जाउंगी तो बोलोगे ये बेकार है जब तक की बारहवी नहीं होती ... थोड़े उदासी व थोड़े गुस्से में बोली वो ..
~ बेटा ,जिन्दगी में हमारे लक्ष्य स्थिर नहीं होते ,समय के साथ वो भी बदलते हैं ...
कुछ ख़ास समझ नहीं आया उसे ,फिर भी वो शांत होकर बैठ गयी अपनी जगह पे ..

अगस्त 2012 :( बेगू सराय जिला बिहार )

~ क्या उम्र है तेरी ?
~ 14 साल ,पुलिस इन्स्पेक्टर की आँखों में आँखे डाल के बोली वो ..
झूठ बोलती है ये .. अठठारह बरस की है ये .. उसकी माँ बेगुसराय थाने के उस इन्स्पेक्टर को बोलने लगी ..
~ सर मम्मी झूठ बोलती है ताकि मेरी शादी रहमान भाईजान से करवां सके ...
~ चुप कर तू  ,चार अक्षर क्या पढ लिए चली बकवास करने ... 
~मोह्फीज ... तेरा ट्रेक रिकार्ड सब है मेरे थाने में .. कितने मर्डर के केस है तेरे खिलाफ सब जानता हूँ मैं ,इंस्पेक्टर बोला ...
~ साब लौण्डिया झूठ बोलती है .. मेरी भांजी है मुझे पता है अठठारह बरस की है य
~ लडकी को देख के पता चल रहा है की पंद्रह से ऊपर नहीं है ..और तुमने इसकी जबरदस्ती शादी करने की कोशिश की तो मैं "मोह्फीज  तुझे और तेरी   बहिन यानि इसकी  माँ दोनों को अन्दर  करूँगा लम्बे के लिए " ...
बताऊँ कि   हमारी एक  साहसी सहयोगी  की  गहरी कोशिश के तहत ( बेगू सराय के एसडीएम् , थानेदार से लेकर   डीएम तक फोन खड्कानॆ के बाद ही पुलिस पहुँची  थी सोना के गाँव ) ..

सितम्बर 2012 : ( इन्फोसिस चंडीगड़ )

~ हैलो , जी मैं दर्शन बोल रहा हूँ ,सोना से बात करवा दीजिये ..
~ अरे सर मैं सोना का मामा "मोह्फीज " बोल रहा हूँ ..आपका नाम सूना है ..
~ देखिये हम लोग पिछले 5-6 साल से बच्चों पर इसलिए मेहनत कर रहे थे ताकि एक दिन ये बच्चे अपने पैरों पर खडे हो सकें ..
~ सर आप फिकर न करिए ..हम सोना को यहीं बिहार में पढ़ाएंगे ... लीजिये सोना से बात करिए ..
~ कैसी है बेटा ... ?
~ सर मैं ठीक हूँ ,आप कैसे हैं ,सब लोग कैसे हैं प्रयास में ? 
~ सब ठीक हैं बेटा , कब आयेगी नोएडा ? 
~ सर मामा यहीं पढने का इतंजाम कर देंगे .... 

अक्टूबर 2012 : (प्रयास नोएडा सेण्टर ) 

~ तू तो फोन पर कह रही थी की तू वहीं पढेगी ?
~ सरजी मेरी गर्दन पर चक्कू रख दिया था ,तो मैं क्या कहती ?
~ तो तुझे मारा भी ??
~ सरजी मुझे खूब मारते थे ..मेरी पसलियाँ ऐसे आवाज करती हैं जैसे टूट गयीं हों .. बहुत दर्द रहता है सर .. और वो रोने लगी ...
~ फिर वापस कैसे आ गयी तू ?
~ पापा और मम्मी की लड़ाई हो गयी एक दिन और पापा मुझे और छोटी भाई को लेकर आ गए ...
~ पढेगी आगे या नहीं ??
~~ क्यों नहीं पढूंगी सर ..जरूर पढूंगी ..मगर स्कूल वाले दुबारा लेंगे मुझे या नहीं पता नहीं ..
~ हम करते हैं बात स्कूल में ...

नवम्बर 2012 : ( स्कूल )

 सोना के पापा को उसके भाई के स्कूल वालों ने दूबारा एडमिशन के लिए मना कर दिया था .. बोला की आप चार महीने बाद फिर गाँव चले जाओगे ..और फिर उसके चार महीने बाद लौटोगे ..हम कितनी बार एडमिशन करेंगे ...
उसके पापा भी केवल इसलिए स्कूल में बात करने गए क्योंकी हम उनको बार-2 समझा रहे थे ,हर किस्म की मदद कर रहे थे ... स्कूल वालों के बर्ताव से परेशान होकर उसके पापा ने ये शर्त रख दी की "सोना भी तब ही स्कूल जायेगी जब उसका भाई स्कूल जाएगा " ...
अगले दिन ...स्कूल प्रिंसिपल के आफिस में 

~ मैडम में आई  कम इन ??
~ यस कम इन प्लीज ...
~ मैडम मुझे अपने भाई के एडमिशन के लिये बात करनी है ..
~ बेटा आपके पापा को कल बता तो दिया था की "एडमिशन नहीं हो सकता "
~ मैडम ,एक बार मेरी बात सुन  लीजिये प्लीज ..
~ अच्छा बोलो ...
~ मैडम ,पापा  मुझे भी स्कूल नहीं जाने देंगे अगर भाई स्कूल नहीं गया तो .. 
~ बेटा तुम तो अच्छी स्टूडेंट थी मगर तुम्हारे भाई के लक्षण अच्छे नहीं हैं ..
~ मैडम लेकिन अगर आपने मेरे भाई को एडमिशन नहीं दिया तो ,पापा मुझे भी स्कूल नहीं जाने देंगे और मेरा "कैरियर " ख़त्म हो जाएगा ..मम्मी एक-दो साल मेरी शादी कर देगी ... मैडम प्लीज मेरी मदद कीजिये ना ,प्लीज ..
~ ठीक है अच्छा ,तुम्हारे भविष्य को संवारने की कोशिश के तहत तुम्हारे भाई को आख़िरी मौक़ा दे देते हैं ...
~ थैंक यूं सो मच मैडम ... 

ये वही स्कूल है जहां मार्च 2008 में सोना चार अन्य बच्चों के साथ अपने एडमिशन के लिए टेस्ट देने गयी थी ..हाल इतने खराब थे की सब लोगों की  रोनी हालत थी ... बहुत जिद के बाद स्कूल ने सोना और सूबी को क्लास थर्ड और बाकी तीन बच्चों को क्लास सेकंड में ले लिया .. और चार साल बाद आज सोना सेवेंथ क्लास में फिर से स्कूल जाने लगी है,इतना कुछ सहने के बावजूद उसके हौंसले बुलंद हैं ..और जिस लिहाज से उसने  प्रिसिपल मैडम को अपनी बात रखी वो सच में "परिवर्तन की बयार है , शिक्षा की बयार है ,और छोटी सी सोना के  बुलंद हौंसलों की बयार है "...
.....

PS: अगर आप सोना जैसी अन्य बच्चों की मदद करना चाहें तो  mail me:- darshanmehra@gmail.com...

तुम

on Monday, July 2, 2012
Skype conversation
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मैं : एक बात है जिसके  लिए  मैं स्योर हूँ  
तुम : क्या बे  ??
मैं : I think "तुम मुझे सबसे ज्यादा जानती हो "
तुम : हम्म हाँ शायद  ...  :) 
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मैं बता दूं कि हमारे रिश्ते के दरमियान अगर किसी ने सबसे ज्यादा साथ  दिया है तो वो है Internet ... शुरू से अब तक ..
Skype के सामने बैठे-२ एक दिन तुम्हें देख  कुछ लिखने को मन किया या शायद तुमने ही जिद की थी  ..
१० मिनट के बाद ये कविता बन के निकली थी ..
आज  तुम्हारा जन्मदिन  है ! और ये  "कविता"  तुम्हारे  जन्मदिन का गिफ्ट है, हाँ सही पढ़ा तुमने केवल ये "कविता" ही तुम्हारा गिफ्ट है  ...और हाँ अब मत कहना कि तुम्हारे लिए कुछ लिखा नहीं अब तक ...                               
                                    
     तुम                                 

कुछ  ख़ास  है वहाँ उस चेहरे पे 
कुछ  मधुर अहसास है वहां उस चेहरे पे
       कुछ प्रभा के संगीत सा ,वीणा की तान सा ..
       कुछ है जो खींच सा लेता है अपनी ओर
मिथ्या नहीं ,आकर्षण नहीं ,अँधेरे में दिये कि लौ सा ..
दिये की लौ, जो उज्जवल कर दे सारी कालिमा जीवन की ...


कुछ  ख़ास  है वहाँ उस चेहरे पे 
कुछ  मधुर अहसास है वहां उस चेहरे पे 
रक्तवेग बढ़ा देता  है ,उस चेहरे का एक  दीदार 
चेहरे पे मेरे मुस्कान व होंठों पर नमीं बिखेर देता है वो अहसास   ,
 शायद उन आखों की गहराइयों में भीगने की नमी  है ये ...
कुछ तो है ,कुछ तो ख़ास है उस चेहरे में 
इक अहसास ,अधपका सा अहसास 

एक तरुण वृक्ष सा लगता है ये चेहरा कभी ..
गर्म ,उष्ण रेगिस्तान की तपिश से ढ़ाकता तरुण वृक्ष
कभी एक उफान भी नजर आता है वहां
पहाडी नदी के बहाव सा ..   
कभी तरेंगे आती हैं
तालाब में पत्थर के बाद सा
                           
                         एक स्वप्न है ,एक आशा
                         प्रेयसी की परिभाषा है ..
                        उस लौ में ज्योत मुखर यूँ ही जगमगाती रहे 
                        दिवाली के ओज सा जीवन यूँ ही प्रकाशित करते रहे ..
                        छोटी सी यह "अभिलाषा"  है ....

कुछ तो "जरूर"  ख़ास है.. वहां उस चेहरे पे ...

PS :देखो कितना इत्तेफाक है कि आज "चाँद" भी  पूरा नजर आ रहा है :)

" रवैया.. "

on Saturday, May 26, 2012

1.

हड्डियों के भीतर तक पहुँच रही सर्दी से कंपकंपाते शरीर को मफलर ,जैकेट ,दस्तानों और मंकी कैप से थोड़ी राहत मिली ...  पहले मन किया आज छुट्टी कर दी जाए बच्चों की ,शीत लहर अपने बल का अहसास कराती सी  जैसे शरीर को घावों से छलनी कर रही थी !  "इतनी कटीली व कष्टदायी" थी ये सर्दियां ऊपर से  घुप कोहरा दिल्ली की सर्दी को जानलेवा बना देता है  ! मगर बच्चों की "लगन" और  "हौंसले" को याद किया तो छुट्टी करने का विचार सर्दी की धुप की तरह गायब हो गया ...२००८ के  जनवरी महीने  का तीसरा हफ्ता होगा , बच्चे  बड़ी  " ABCD .. " सीखने की लड़ाई जीतने के पश्चात छोटी " abcd "  सीखने की जंग की तैयारी कर रहे थे ...  6 X 10 फीट के कमरे में , गंदे नाले की तरफ से वही कटीली सर्द हवा अपना  पराक्रम प्रदर्शित करते हुए मेरा और इन 7 - 8  बच्चों का जैसे  इम्तिहान ले रही थी  .. नाले की तरफ की दीवार में खिड़की नहीं है मगर दीवार में एक-२ ईट  छोड़ कर, देशी हवामहल बनाने  की ये तरकीब सर्दियों में कतई दुखदायी साबित होती  है .. 8-9  साल की शबनम  काफी कन्फ्यूज है छोटे "बी" और "डी " में .. आधा अंडा , खड़े डंडे के सीधी तरफ लगेगा या उल्टी तरफ ... मगर ये क्या उसके  हाथ तो  कपकपां रहे हैं ..ध्यान खींचो तो  झुग्गी की उस लडकी का पूरा शरीर काँप रहा है .. बुखार नहीं है मगर कडाके की ठण्ड बच्ची को भी कोई रियायत नहीं दे रही  ..
~ बेटा स्वेटर कहाँ है ? केवल एक  पतली से फ्राक  में क्यों आयी है ? मम्मी  कहाँ  है ? जल्दी से बुला के ला !! ... मेरे इतने सारे  सवालों का जवाब क्या देती ,सिर नीचे करके चुप हो गयी वो ..
~ क्या हुआ ??
~ सरजी एक ही स्वूटर है मेरा ,मेरी बहिन  जुबैदा का और मम्मी का ,मम्मी को हस्पताल ले गये हैं  ना (उसकी माँ ७ बच्चों के बाद फिर से पेट से है ) तो वो मैंने मम्मी को पहना दिया ... 

एक मिनट के लिए मैं खुद को दुनिया का सबसे मजबूर व कमजोर  इंसान समझने लगा ... कुछ भी नहीं कर सकता था मैं ... मगर "कुछ न कर पाने की ये मजबूरी " कभी-२  बहुत  जरूरी है शायद ,हमको अपने वर्चस्व पे कहीं गुमाँ न हो जाए.. इसलिए जरूरी  ... 

~ बेटा "स्वूटर" नहीं "स्वेटर"  ... अच्छा तू एक काम कर ,आज की क्लास रहने दे ,घर जाकर खाना खा और बिस्तर में घूस जाना ,वरना ठण्ड से बीमार हो जायेगी ...
~ सरजी नहीं , मुझे पढ़ना है .. 
उसने अपनी कापी आगे की ,छोटे "डी" की जगह "बी" बनाया था ....

रिक्शे से वापस  आते समय मैं सोच में डूबा रहा कि वाकई में हम किन छोटी -२ बातों को लेकर दुखी व निराश रहते हैं , "साधनों की कमी ,बदकिस्मती का रोना ,कम  CTC का रोना ,और हाँ levi's की जींस का डिस्काउंट के बाद भी छब्बीस सौ का होने का रोना  ... जैसे कि खुश व संतुष्ट न होना हमने अपना धर्म सा बना लिया हो ... हाँ हुमने ,हम सबने ...

शबनम से पूछो एक बार तो बतायेगी वो कि हमारी जिन्दगी  कितनी "भरपूर व खुशहाल "  है , .... मगर काश कि  हम अपने नजरिये में भी भरपूरता व खुशहाली  का अहसास कर पायें  ...
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२.

इन्फोसिस चंडीगड़ मेरी नई कर्मभूमी , आई टी कंपनियों की भव्यता का पूर्ण प्रदर्शन ... शाम के ६ बजे बाहार निकलो तो जैसे मेला लगा है हर तरफ .. स्वीमीइंग पूल में गोताखोरों की हलचल है, तो जिम में हर कोई हृतिक रोशन की तरह "एब्स" निकालने के लिए जी जान से मेहनतकश  ... ८-१० ट्रेडमिल पे जब लड़के लडकियां दौड़ रही होती हैं तो लगता है जैसे जिन्दगी भी इतनी ही तेज रफ़्तार है , मगर ट्रेडमिल की ही तरह एक ही स्थान पर कायम भी  ... हमें अहसास होता तो है कि हम आगे बढ़ रहे हैं, मगर असल में वही निराशाएं  और संशाधनो की कमियों का रोना हमको एक ही स्थान पर कायम रखता है  .. 

                 शतरंज ,कैरम ,टीटी ,बैडमिन्टन ,टेनिस ,बालीबाल ,बास्किटबाल ,क्रिकेट , फुटबाल सभी कुछ तो है ... और हाँ कुछ बाशिंदे गिटार के साथ ड्रम की धुन मिलाकर गीत गा  रहे हैं तो कई सुन्दर लडकियां एरोबिक्स में म्यूजिक पर थिरकती रहती हैं ... इसी सबके बीच बहुत विशाल फूडकोर्ट  जहाँ पर सैकड़ों लोग भोजन कर सकते हैं ... तकरीबन साढ़े पांच बजे मैंने चाय की पर्ची कटवाई और चाय लेकर पीछे मुड़ा  ... एक व्यक्ति पर दूर से नजर पड़ती है ... कुछ ख़ास है उसके चेहरे पर ... करीब ६00-७००   लोग बैठे होंगे फूडकोर्ट  में !  मगर उसके चेहरे पर जितनी खूबसूरत हँसी थी वैसी किसी के भी चेहरे पर नहीं थी ... "ओज" इतना मनमोहक था कि कारण ढूँढ पाना मुश्किल था ... मैं २ मिनट तक देखता रहा और प्रभावित होकर एक सोच में डूबा चाय पीने लगा ... अतिश्योक्ति कतई नही होगी अगर मैं ये कहूं कि पूरे हॉल में उसके चेहरे की चमक अद्वितीय और आकर्षक थी ...कारण  समझ पाना मुश्किल था , चूंकी आई टी कंपनी का पेशेवर अक्सर तो हज़ारों प्रश्नचिन्हों में फंसा ,भविष्य ,परिवार,प्रोजेक्ट, कैरियर और EMI की चिंता करता हुआ  तथाकथित दुखों ,असंतुष्टी  व निराशा के भंवर में फंसा हुआ रहता है ...सो उसके इतना खुश होने का कारण ढूँढ पाना अत्यंत मुश्किल था ...

                       चाय पीने के बाद एक कालेज के मित्र से मुलाक़ात हो गयी और मैं अपने सारे विचारों को समेटता सा कालेज के दिनों की यादों में मशगूल हो गया ... थोड़ी ही देर में मेरे बगल वाले क्यूबिकल का एक सहयोगी एक व्हील-चैयेर धकेलता  हुआ मेरे सामने से गुजरा ... मैं अचंभित था कि  व्हील-चैयेर पर बैठा हुआ इंसान वही मनमोहक हँसी वाला इंसान था ...और सबसे ज्यादा अचंभित और  भयावह बात यह थी कि उसका निचला शरीर यानी कमर से नीचे का शरीर  था ही नहीं ,शायद किसी भयावह ऐक्सीडेंट का शिकार हुआ  होगा ..केवल ४०-४५ प्रतिशत शरीर ही मौजूद था ..... वह अभी भी उतना ही खुशमिजाज और हर्षित था ... सामान्य सोच के हिसाब से और लोजिक्ली मुझे उस इंसान से सहानुभूति होनी चाहिए थी मगर उसके चेहरे के ओज व खुशी से मुझे  बाकी सब से सहानुभूति होने लगी ... सच ही  है कि केवल सोच का फरक है ....

   " सोच " और " जिन्दगी की ओर हमारा रवैया "  ही  हमें खुश और दुखी बनाता है  .. साधन चाहे कितने भी हो ,कम लगते हैं और चाहे  कुछ भी न हो , मगर संतुष्टी फिर भी हासिल कि जा सकती है ..
     चाहे वो व्हील-चैयेर पर बैठा अत्यंत ओजवान व्यक्ति  हो या नन्ही सी बच्ची शबनम , बिना कुछ कहे काफी कुछ सीखा जाते हैं हम सबको .....

Pictures : Courtesy Google

"" I QUIT ""

on Sunday, May 22, 2011
"पर्दा है पर्दा ,पर्दे के पीछे ,पर्दा नशीं को बे पर्दा ना कर दूँ तो ......
तो ....
तो....
तो ओ ओ .....

अकबर मेरा नाम नहीं ... "
                    कुछ ख़ास है इस गीत में , आप सबके के लिए ना हो शायद, मगर मेरे लिए तो है ..काफी ख़ास है .. वो भी काफी ख़ास था ..और ये गाना जब वो गाता तो पुरी इलेवंथ बी यानी "कक्षा ग्यारह ब " झूम उठती थी .. मेरे आसपास के लोगों में मुझे आजतक सबसे ज्यादा जिंदादिल और मनोरंजक कोई लगा तो वो ही था ! हम लोग रोज किसी खाली पीरीयड का इन्तजार करते ताकी "हरेन्द्र" की आवाज़ में किशोर कुमार के गाने सुन सकें .. और जिस दिन बारीश हो और मास्साब ना आयें हों उस दिन क्लास की कुंडी लगा के अपनी ही धुन में "कक्षा ग्यारह ब " के सहपाठी लकड़ी के अपने-२ डेस्क को बजा-२ के कव्वाल बन जाते .. और हमारा मुख्य कव्वाल होता "हरेंन्द्र" और पुरी क्लास गा रही होती "पर्दा है पर्दा ,पर्दे के पीछे ....." उसके इस गीत का जादू सारी क्लास को झूमा देता हर बार ...
                          दसवीं के बोर्ड के एक्जाम्स के बाद अपनी क्लास में सिक्का तो गाड ही लिया था मगर फिर भी "विज्ञान वर्ग " में एडमिशन लेने वालों में एक बन्दा मिला जो थोड़ा चर्चा में था ,अल्मोड़ा से आया था और ऊपर से फस्ट डिवीजन ... उसने मेरे बारे में सुना मैने उसके बारे में पहले ही दिन कुछ दोस्ती सी हो गयी ...वैसे नियमतः क्लास फस्ट या फिर क्लास सिक्स्थ वाले दोस्त तब तक काफी अच्छे लंगोटिया यार बन जाते हैं मगर हरेन्द्र के व्यक्तित्व में कुछ था जो वो सबका चहेता था और मेरा काफी अच्छा दोस्त बन गया था ...
                    किशोर कुमार के गाने जितनी गहराई और इबादत के साथ वो गाता था ,उसके अलावा आजतक मुझे आसपास कोई नजर नहीं आया ..
                 मेरी हैण्ड राईटिंग जहाँ "गांधी जी" की राईटिंग से भी बुरी थी ,उसकी "दिसंबर" में रानीखेत से दिखती " हिमालय " की चोटियों सी ख़ूबसूरत.. एक अजीब सी गहराई और ठहराव था उसमें .. पता चला वृद्धा माँ को पिता ने गाँव में छोड़ा हुआ है और दूसरी माँ ,हमेशा की तरह दूसरी माँ ही जैसी थी ,कितना सच था ये कभी नहीं पता चला !
              कुछ लोगों के चेहरे में एक मंद सी मुस्कराहट हमेशा खिली रहती है ,ईश्वरीय देन मानो या फिर व्यक्ति विशेष के प्रयत्नों का असर ,मगर जो भी हो उस मुस्कराहट को कायम रखना मुश्किल होता होगा .. विषम परिस्थितियों में खासकर ... मगर हरेन्द्र का खिला हुआ चेहरा हमेशा याद रहता है .. अपना तो ये हाल है कि कैमरे के सामने एक पल के लिए भी मुस्कुराना जटिल लगता है .. :) ..
उसके घुंघराले बाल ,शुरुवाती दिनों के सचिन की याद दिलाते थे ...गोल से  चेहरे  पर मंद सी मुस्कान , ओज बिखेरता रहता था... पांच फीट ७ इंच का मजबूत कद काठी  का नवयुवक था वो ,सपने भी उसी उम्र के ...प्रिया गिल याद है किसी को ?? मुझे याद है क्योंकी वो चाहता था प्रिया गिल के साथ पूरा भारत भ्रमण करे ... उसकी फेवरेट हीरोइन थी " प्रिया गिल" ... अरे यार "सिर्फ तुम " पिक्चर की सीधी साधी हीरोइन .....
              पूरा एक साल बहुत मजे में बीता "ग्यारह ब" का .. आखिर-२ के दिनों में उसका स्कूल आना कम हो गया .. कभी-२ मिलता था ... खामोश सा हो गया था .. बताता नहीं था कुछ ... "पर्दा है पर्दा " गाना नहीं गाता था .. कुछ परेशानी थी उसको जो वो किसी को नहीं बताना चाहता था ... चेहरे की मुस्कराहट गायब हो गयी थी .. एक दिन पता चला कि हरेन्द्र फेल हो गया ... मैं "बारह ब" का छात्र हो गया और वो फिर से "ग्यारह ब" में ...
                                   अब वो चूंकी हमारी क्लास में नहीं था इसलिए ,न ही हमारी क्लास में किशोर कुमार के गाने गाये जाते और न ही कव्वालियाँ ... कभी-२ मिलता भी तो बहुत शांत और अपने चेहरे की मुस्कुराहट तो शायद खो ही दी थी उसने... पता चला कि नशा भी करने लगा है ,समझाने कि कोशिश की तो बोलता था कि तुझे गलत पता है मेरे बरी में "मैं कोई गुटखा नहीं खाता न ही सिगरेट न ही कोई और नशा "... उसको भी पता था मुझे भी कि सच क्या है और झूठ क्या ...

इंसान के जीवन में कई ऐसे दौर आते हैं और शायद सबके जीवन में आते हैं जब सब निरर्थक लगने लगता है ..उन परिस्थितियों में दो ही रास्ते होते हैं " भाग लो (either participate ) या भाग लो ( or run away) " ... अगर इंसान अपनी ज़िंदगी को निरर्थक ही सिद्ध करनी पे आमदा हो तो भगवान् भी शायद कोई मदद नहीं कर सकता ... हरेन्द्र के परेशानी का रूट कौस नहीं पता था मुझे, मगर ये जरूर पता था कि कुछ गहरी परेशानी है ... काफी बार कोशिश कि उसे समझाने कि, ,बात करने की, मगर कुछ लाभ नहीं हुआ ...



स्कूल के आख़िरी दिनों में सबकी तरह मुझे भी "स्लैम बुक " बनाने का शौक छाया .. अब अपनी तारीफ सुनना मुझे हमेशा से ही पसंद रहा है ... यद्यपि सबको पसंद होता है मगर मैं खुलेआम स्वीकार करता रहता हूँ :) .. कारण जो भी था कुछ दोस्तों को उनकी यादों को साथ लेते हुए जीवन में आगे बढने का ये प्रयोग "स्लैम बुक " के रूप में मुझे तो पसंद आया ...
                                     बारहवीं के बोर्ड के एक्जाम्स की तैयारियों की वजह से मुझे वो काफी दिनों से नहीं मिला था .. मुझे उससे भी अपने "स्लैम बुक" भरवानी थी .. साथ लेकर घूमता था में स्लैम बुक ताकि वो मिले तो उसको दे दूँ ... आखिरकार एक दिन मिला मुझे वो ... काफी देर हडकाया उसे ... नजर नीचे रख के वो सुनता रहा ..पूछा तो,हमेशा की तरह बोला कि "सब ठीक है "... मैं स्लैम बुक देकर बोला कि "जल्दी भर के लौटा देना " बाकी लोगों से भी भरवानी है .. पुरानी वाली मुस्कराहट एक बार फिर दिखी उसके चेहरे पे .. थोडा गदगद होकर वो बोला " यार तुने मुझे डायरी लिखने का जो मौक़ा दिया ना, तू समझ नहीं सकता कि मैं कितना अच्छा महसूस कर रहा हूँ ,मुझे लगने लगा था कि मेरी हरकतों कि वजह से शायद मुझे दोस्त भी ना माने तू अब ...."
मैं धीमे से मुस्कुराया और बोला " अबे ज्यादा स्टाइल न मार ,जल्दी लौटाना इसे भर के "

               किसी के हाथ भिजवाई थी उसने वो डायरी ... लिखा हुआ था कि "ग्यारह ब" की उस क्लास में केवल तुझसे और जग्गा से करीबी दोस्ती थी ,अच्छा लगता था ,अब नई क्लास में कोई भी दोस्त नहीं है ... अपनी व्रद्धा माँ का सहारा बनना एकमात्र महत्त्वकांक्षा लिखी थी .. प्रिया गिल के साथ भारत भ्रमण करना एक सपना था उसका ,.. उसको याद थी वो बात जो मैंने कभी बोली थी उसे कि "मैं सबको ये प्रूफ करना चाहता हूँ कि गांव के लडके भी पढने में अच्छे हो सकते हैं खासकर कुछ टीचरों को " वो काफी प्रभावित था इस बात से ....
                          मेरी स्लैम बुक में कहीं भी नहीं लिखा था कि "मौत" के ऊपर अपना द्रष्टिकोण पेश करो ... मगर हरेन्द्र अकेला इंसान था जिसने मौत के ऊपर भी अपनी राय रखी थी ..

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About Death : " मृत्यु एक कड़वा सच है ,निश्चित है ,जिन्दगी तो बेवफा है एक दिन साथ छोड़ जाती है मगर म्रत्यु तो अपनी मित्र है जो हमें अपने आगोश में ले लेती है ...प्रत्येक प्राणी को अपनी मृत्यु का खौफ होता है जिससे प्राणी वह कर्म करने में हिचकिचाता है जिसमें उसकी मृत्यु की आशंका होती है ! जो व्यक्ति शान और स्वाभिमान की मौत मरता है उसके लिए मृत्यु एक कड़वा सच नहीं बल्कि एक सुनहरा अवसर एक त्यौहार है ... !

वह इंसान महान है जो जिन्दगी जिन्दादिली से जीता है तथा उसकी मौत शहादत होती है

"शहीदों की चिताओं पे हर वर्ष लगते हैं मेले ,क्योंकी उनकी मौत ,मौत नहीं शहादत है एक सुनहरा अवसर एक त्यौहार है ,इस अवसर इस त्यौहार को सारी दुनिया शौक से मनाती है "

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ये सब पढ़कर अजीब लगा मुझे , अब शायद समझ आता है कि उसने मौत जैसा विषय क्यूँ चुना तब अभिव्यक्तिकरण के लिए ...बारहवी के बाद मैंने रानीखेत छोड़ दिया ... कालेज की छुटियों के समय मैं एक बार लौटा तो गाँव जाते वक़्त मिला मुझे वो .. हमारी आख़िरी मुलाक़ात थी ... कौन जानता था कि आख़िरी मुलाक़ात होगी .... पुरा हुलिया बदल चुका था उसका ... दुबला पतला मरियल सा हरेन्द्र , एक अच्चम्भित सी स्थिति थी मेरे लिए.... पहाडी रस्ते में अँधेरे के वक़्त मिला वो , कुछ बड़े अजीब और घिनोने से लोगों के बीच ...
                   मेरे गले लगा ,मुस्कुराने की कोशिश उसकी नाकाम हुई और रुवांसा सा हो गया .. पूछा तो हमेशा की तरह बोला सब ठीक है ..... मुझे पता था वो कभी कुछ नहीं बतायेगा ....उस पर से एक अजीब सी गंध आ रही थी भांग की सी ... बाद में कुछ और दोस्तों से पता चला कि हरेन्द्र ड्रग्स का आदि हो चुका था .... क्या कर रहा है आजकल पूछा तो बोला बस यार वक़्त काट रहे हैं .. मेरे नए कॉलेज से लेकर घर तक सबके हाल पूछे उसने और खुद की ज़िंदगी के बारे में पूछने पर हमेशा की तरह एक "पर्दे के पीछे ढक के चला गया ... शायद इसीलिए उसको भी वो गाना पसंद था "पर्दा है पर्दा... "
             हर इंसान की एक अजब लड़ाई है ज़िंदगी से और जिस से बात करो वो अपनी लड़ाई को सबसे मुश्किल और संघर्षपूर्ण बताता है .. कुछ crib करते हैं ,कुछ डट के लडते हैं और कुछ हार मान जाते हैं ... "3 Idiots " के उस स्टुडेंट की तरह हरेन्द्र ने भी एक दिन अपनी जिन्दगी की किताब में "हार" कर लिख ही डाला




                                                " I Quit .... " 

PS1 : "कुछ दिनों पहले स्वर्गीय हरेन्द्र का जन्म दिवस था,उस जीवन अंतराल के कुछ पन्नों को ब्लॉग पर लिख कर उसकी स्मर्तियों को हमेशा बचाए रखने के लिए ये लिखना पड़ा और शायद कुछ तो जरुर ही सीख सकते हैं हम सब उसके जीवन और मृत्यु दोनो से "

PS2 : "दोस्ती में आप निर्णायक न होकर सहायक होते हो ,हर स्थति में ".. मगर तू जिस जगह भी है आज मेरे दोस्त ,हार मानकर "I Quit " वाला सोल्यूसन जो तुने ईजाद किया वो सरासर गलत था ,भयानक था और दुखदायी भी.... इसका समर्थन कोई भी दोस्त नहीं करेगा ...

PS3 : All of you can pray with closed eyes for the peace of Harendra's noble & pure soul for a moment atleast .....

" F . R . I . E . N . D . S . "

on Monday, March 7, 2011

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हम चले जायेंगे ,राहें  चलती रहेंगी  ...
हम गुनगुनायेंगे ,तुम गुनगुना लेना ..
                           दसवें सावन के बाद ,
                           इक दिन हम बड़े हो लिए ..
तुम चले दिये,हम भी ना रुके 
गम था छुटने का और खुशी कुछ नए का ..                 
                          टिन के छत वाले स्कूल की 
                          बरसाती दिनों का संगीत ..
हम न सुन पाए फिर कभी 
हम- तुम जो साथ न रहे ..
                          कुछ फिर मिले राहगीर,कुछ नए वादे किये 
                          अचानक एक दिन फिर  बुशर्ट की बाहें छोटी हुई ..
        फिर खड़े  हम उसी  मोड़ पे 
        तुमने जब  नई राहें  चुनी ..
            पहाडी कस्बे की हवा ने 
            हमसे रुख मोड़ लिया 
    हम जिए हम बढे 
    तुम न थे ,बस तुम न थे ..
          
 फिर  नई  शुरुआत में              
तुमने हमको थाम लिया ..

 हम जिए हम बढे 
 तुमने साथ जो दिया ..
            दिन वो फिर से  आ गया 
            कमाने के फेर में  धकेला  गया ..
  राहें बदली ,शहर बदले 
  बदले छत ,आकार  जेबों के ..    

                फिर पाए कुछ  नए चेहरे 
                याद दिलाते कुछ तुम्हारे अक्स की 
   हम जिए हम बढे 
   तुम जो साथ हो लिए ..
                फिर ये दिन आ गया 
                इक पुराना  मोड़ सा ..
  फिर उसी मोड़ पे ,फिर उसी अहसास में 
  कुछ चलेंगे ,कुछ बढेंगे ,कुछ तो  छुट ही  जायेंगे ..
                 जीवन के इस निरंतर प्रवाह में 
                 हम सीखे ,हम बढे ,पाते रहे  "तुमको " नए रूप में ..
 अक्स बदले ,शहर बदले और बदल गयी वो छतें 
 विश्वास कायम है मेरा ,भावना वो बदलेगी ना 
                 "यारी " की  ये कस्तूरी खुशबू ..
                 चलती रहेगी ,तुम जो चाहो तो ....

"दर्शन"
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PS:- Its for you ,all of my lovely " FRIENDS "...

बूबू जी

on Tuesday, January 25, 2011


सन्नाटे और सुकून में सिर्फ थोड़ा सा फर्क मालूम होता है मगर यथार्थ में देखा जाय तो "सन्नाटा " दर्द का आभास कराता सा हो सकता है जबकि सुकून "आत्मीय" सा  ! यद्दपि  दोनों को परिभाषित करना मेरी क्षमताओं से परे है ! कुछ सुकून सा महसूस हुआ तो लिखने बैठा ,सोचा कुछ तो लिखा जाए ..देखते हैं ये अध्याय कहाँ जाकर "इति" होता है !
                                  पहाडी  गाँव में रात की शादी ,कुछ मर्दों का समूह पूडियां बनाने में व्यस्त ! वो पूड़ी बनाने वाली मशीन चलाने वाला व्यक्ति अपनी रफ़्तार में कुछ इस तरह मग्न होता है कि भूल जाता है पूड़ी का गोल होना उतना ही आवश्यक है जितना की स्वादिष्ट होना !
             "अगर किसी सर फिरे बाराती को ये अर्ध चंद्राकार पूड़ी पसन्द नहीं  आयी तो बौबाल हो ही जाएगा, ध्यान रखो रे लौंडो  हम लडकी वाले जो ठहरे" तम्बाकू की चिलम गुडगुडाते हुए बूबू  बोले ( बूबू यानी कोई भी उम्रदराज व्यक्ति ,वैसे बूबू का शाब्दिक अर्थ "दादाजी" या "नानाजी" ) !
   चूंकी ननिहाल था तो सारे या तो मामा कहलाते थे या फिर बूबू ! पहाडी गाँव की क्या खूब खासियत है   कि  चाहे  अपने गांव के लोग हो या फिर ननिहाल के हर व्यक्ति कुछ ना कुछ रिश्ते में जरूर कहलायेगा !         और इन रिश्तों का गोलमाल कुछ इतना अजीब है कि कुछ लडके जो उम्र में हैं तो छोटे, मगर हमारे "चाचा " कहलाते और भाभी के उम्र की महिलायें "दादी" ! एक बात याद आयी  कि नई दुल्हन गाँव में पहुँची ही थी कि मुंह दिखाई के समय मेरी बहन हाथ जोडते हुए बोली "दादी प्रणाम " ..और बेचारी नई दुल्हन के चेहरे की सकपकाहट देखने योग्य थी ,बहन द्वारा ये मश्खरी  जानबूझ के की गयी थी मगर सच में वो रिश्ते में "दादी" लगती थी :P  !
                 मेरी उम्र से कुछ १-२ साल बढ़ा मेरा मामा ,वो भी उस पूड़ी बनानी वाली मंडली का सक्रिय सदस्य था ,चूंकी  मैं मेहमान था ननिहाल में, मुझे ये लाभ अर्जित था कि मैं केवल मंडली में बैठा हुआ  तो था मगर मुझे  कोई काम नहीं दिया गया था ! ये मामा मेरे दूर का रिश्ते वाला मामा ही  था !
                                           ऐसा ही कोई मामा बोला "यार मुझे तो वो पीली वाली  पसंद आयी और मैने जब उसको थोड़ी देर निहारना शुरू  किया तो वो भी मुझे एकटक देख रही थी ,लगता है आज की शादी में अपनी शगाई भी हो ली :) " ये सब सुनकर सबके सब युवा ठहाके में डूब गये !
" बेटा बारातियों की तगड़ी टीम आयी है कुछ गुश्ताखी मत करना कहीं "शगाई"  के बजाय "धुलाई" न हो जाए "  किसी समझदार की राय थी ये ,और इन सब बातों के बीच मैं ७-८  साल का बच्चा अपने चेहरे को  भावविहीन करते हुए बैठा ,भावों को छिपाने की  भरसक कोशिश में लगा हुआ !
        किसी अगले  मामा ने बोला  "आज तो भाई रात यहीं कटेगी ,सुना है खुशाली(खुशाली दुल्हन का भाई था ) ने VCR का बंदोबस्त किया हुआ है ,और पिक्चर रात को १२ बजे से पहले शुरू नहीं करेंगे वरना बहुत भीड़ हो जाती है " 
    कोई  चिल्लाया "अबे ऐसे जोर से न बोल सब लोगों को पता चल जाएगा तो किसी को भी पिक्चर नहीं देखने को मिलेगी,बारातियों के लिए पिक्चर आयी है और तुम चिल्लाओगे तो किसी भी घराती को फ्री की पिक्चर देखने को नहीं मिलेगी "
      "अबे तो क्या हुआ नहीं देखने देंगे तो क्या हम पैसे जमा करके खुद नहीं देख सकते ? "
दूसरा पहले से "अबे तू कमाल का ढक्कन है ,फ्री की पिक्चर देखने को मिल रही यहाँ ,और तू पैसे जमा करके पिक्चर देखेगा ???? 
                                  खाना-पीना होने के बाद बारात की मशरूफियत थोड़ी कम होनी शुरू हुई ! मुझे लौट के घर आना था मगर इस अंधेरे में अकेले तो मैं लौट नहीं सकता था इसलिए मैंने मामा से  जिरह की ! पर उसके चेहरे के भाव देख कर लगता था की "पिक्चर प्रेम " उसका भी जाग गया था ! अब जाने अनजाने मुझे भी रुकना पडा ! मेहमान होने के नाते मुझे आसानी से एंट्री मिल गयी जबकी मेरी उम्र के बच्चों को बिलखते छोड़ आँगन के उस टुकडे की तरफ नहीं जाने दिया जा रहा था जहां रंगीन टीवी पर पिक्चर चल रही थी !          
                      "मर्द" और "एलान~ऐ~ जंग" दो पिक्चर लाई गयी थी ,मुझे बस इतना याद है कि दोनों पिक्चरों में "हीरो" कमाल  के "हीरो" हुआ करते थे ! एक तरफ अमिताभ बच्चन यानि "मर्द"  की हर एक  ढिसुम-२ पर तालियाँ बजती ! दूसरी तरफ "जंग" का "एलान" किये हुए धर्मेन्द्र सीने में कवच पहने और म्यान से तलवार निकालते शत्रु की सेना की वाट लगाता तो "बराती" क्या और "घराती" क्या सब चकाचौंध रह जाते ! इस मनोरंजन के बीच अगर मैं सबसे ज्यादा किसी बात से चिंतित था तो वो था नाना जी यानी बूबू  के रौद्र रूप से !
                बूबू का रौद्र रूप का एक किस्सा ये है कि एक बार मैं और मेरा वो मामा पिक्चर हाल में पिक्चर देखने चले गये "फूल और कांटे " .. और ननिहाल पंहुचने के बाद बूबू ने खतरनाक कांटे दिये मुझे .. उनका डायलाग " नतिया ,ऐसा करो तुम अपना झोला झिमटा पकड़ो और वापस हो लो अपने गाँव ,तुम अब बडे हो गये हो ! कल सुबह सुबह रवाना हो जाओ  :) "

                    मर्द और एलान~ऐ~ जंग तो रात्री में देख ली सुबह-२ बूबू  ने जो सबसे पहली बात बोली वो ये थी कि "इतनी रात को और इतनी देर तक टीवी देखने का असर ये होता है कि आपकी आंखे बस खराब ही होने वाली हैं "इस बात को इतने उदाहरणों और इतनी संजीदगी से मुझे सुनाया गया था कि मैं कच्ची उम्र का बालक भयाकूल होकर सच में बहुत डर गया था ! बूबू  मेरे आदर्श इंसानों में से एक थे उनकी बातों और उनके जीवन का मुझ पर काफी असर है और जब वो इस तरीके से बोलेंगे तो भैया मैं तो भयभीत था अपनी आँखों के  लिए ! अगले पूरे हफ्ते मैं जब भी टीवी के सामने बैठता तो हर १० मिनट के बाद मुझे वो "भय " चिंतित करता सा वहां से उठा लेता ! आज वो सब सोचकर बाल मन की सीमाएं ज्ञात होती हैं  !
                             बूबू  जी  जैसे अनुशासन प्रिय ,संगठित ,अभिनव सोच और वक्त के साथ चलने वाला व्यक्ति मैने बहुत कम देखें हैं ! संगीत पसंद होने पर वो "चल छय्यां -छय्यां ,छय्यां छय्यां...." सुन लेते तो कभी भी व्रत ( फास्ट ) न रखने वाले वही इंसान १५ अगस्त या २ अक्टूबर पर देश प्रेम में व्रत रखा करते !
             "लक्ष्य " पिक्चर का वो सीन याद आता है जब ऋतिक को प्रीती के पिताजी बोलते हैं "कि जो भी करो अच्छा करो ,घास काटने वाला बनो तो अच्छे से घास ना काटो तो  क्या मजा और अगर साईंटिस्ट बनो तो अच्छा आविष्कार न करो तो क्या मजा " ,बूबू इस वाक्य को जीवंत करते रहे जीवन भर !
उनको सब्जी काटते देखो तो उस ख़ूबसूरती से काटते कि  पूरी  थाली अलग-२ सब्जियों के रंगों की रंगोली लगती ,अपनी किताबें पढते तो हर एक किताब पर उनकी सुन्दर  लेखनी से लिखे हुऐ नोट्स उनकी रचनात्मकता का कायल बना देती ! मैंने बूबू जी से एक पौधे के ऊपर दूसरे पौधे का कलम लगाना सीखा है ,उनकी एकाग्राता और तन्मयता   ऐसी होती जैसे कोई शास्त्रीय संगीत  का शिक्षक अपने छात्रों को सुर ताल की नई-२ शिक्षा देने में तल्लीन हो !  अपने बगीचे के फूलों से उनको इतना प्रेम था कि जानते थे कि कब कितना पानी और कब कितनी खाद देना है !              
                        ८० कि उम्र में उनके हाथ का खाना क्या लाजवाब होता था ,असल में उनकी लगन और तन्मयता का प्रेम उस भोज में मिठास सा भर देता था ! बूबू जी अपने पास हमेशा एक नोट्स बनाने वाले कापी रखते थे ! कहीं भूल न जाऊं इसलिए  हर कार्य विधिवत नोट किया जाता और वक़्त पे कार्य को निपटाया जाता ! हाँ अगर उनको कोई रात्रि के समय उनका एक पेग रम (RUM -Regular use medicine ) पीते देख ले तो वो  इस आदत का कायल होकर  खुद भी अपना ले :) ! ये एक पेग रम को सच में दवा की तरह लिया जाता था ! शाम के साढ़े सात बजे से शुरू होकर पूरे एक घंटे में ये एक पेग ख़त्म होता था ! दालमोट और पापड़ धीरे-२ उस रम का साथ देते और एक घंटे का ये सफ़र रेडियो पर बीबीसी (खालिश चीजों की ऐसी पहचान की रेडियो पर बीबीसी की ख़बरों को सुने बिना उनका दिन कभी पूरा नहीं हुआ चाहे कितना भी टीवी देख लो ) की खबरे  और फिर डीडी पर समाचार  सुन कर भरपूरता के साथ जीया जाता ! 

 जिन्दगी को जिस "भरपूरता" आनंद व  "उत्साह " से बूबू जी जीते थे वह "अविवरणीय"  और "अतिप्रेरक" है और हमेशा रहेगा ! ..

ढाई साल हुए बूबू जी को गये हुए ,अचानक ही  उनके उस  "जीवन उत्साह" को जीवित रखने कि ये कोशिश "  

जग्गा,घोडा,नाडू और लम्बू- दोस्ती

on Friday, September 24, 2010

बारीश और नोस्टाल्जिया(Nostalgia) में कोई महीन रिश्ता जरूर होता है,बारीक सा !
मुझे तो ऐसा लगता है.. इसीलिये लिखने बैठ गया हूँ आज !

वो रात घनघोर बारीश की ही थी .. पांच दोस्त किसी भयावह जंगल में बने उस अँधेरे कमरे में,"मिट्टी तेल" के दीए के सहारे,अँधेरे से युद्ध विराम के लिए संघर्ष कर रहे थे ..पूरा कमरा धुंए से भरा हुआ और 15-16 साल के ये पांच किशोर उन गीली लकड़ियों में मिट्टी-तेल डाल-२ कर चूल्हे को गरम रखने की भरसक कोशिश में व्यस्त ! रोड से कुछ १०-११ किमी. चढ़ाई करते हुए आप ऐसे सुनसान रास्तों से गुजरते हैं जहां पर दिन के १२ बजे भी अन्धेरा होता है,

अपने जीवन में पहली बार किसी रोड को खत्म होते देखा था यानी रोड का , घुमावदार सड़क मुड कर वापस खुद में समा जाती है .. जगह को कुकुछीना बोला जाता है ! कुकुछीना से ही पहाड़ पर कुछ १०-११ किमी. की चढाई ..हमको पता था कि ऊपर पहुंचकर केवल एक कमरा मिलेगा बिना किसी साधन के ..तो हमारे पास अपना-२ कम्बल से लेकर आटा ,चावल,सब्जी ,दाल और सारी जरुरी चीजें थी ! सांय के करीब सवा पांच बजे जब इस पहाडी रास्ते के शीर्ष पर पहुंचे तो नजारा अवर्णनीय था,इस अँधेरे जंगल से गुजरते हुए घनघोर पहाडी के शीर्ष पर एक बड़ा सा मैदान, अकल्पनीय व अचंभित करने वाला दृश्य ! गोल्फ ग्राउंड की तरह वृहद एवं विस्तृत ! पिछले ढाई घंटों की सारी थकान छु मंतर सी हो गयी ! लगता था जैसे सारी दुनिया तो हमसे नीचे है,पहाड़ों की खूबसूरती का ही आलम है कि नजर दूर तलक चली जाती है .. प्रक्रति इतनी मदमस्त होती है पहाड़ों में,तृप्त करने वाले मोहक ख़ूबसूरती ! शायद इसी वजह से आशीष है पहाड़ों को, बकायदा "देवलोक" भी तो कहते हैं !
अज्ञातवास के समय कौरव ,पांडवों का पीछा करते-२ कुकुछीना(कौरवछीना ) पहुंचे और वहाँ से पांडवों ने इस जंगल से होते हुए इस पहाडी की शीर्ष पर वक़्त गुजारा,इसी वजह से ये जगह पांडूखोली(पांडवों की झोपडी ) कहलाती है . पांच मूर्तियाँ पाँचों पांडवों की हैं और ये जो बड़ा सा ग्राउंड सा जो है इसे "भीम की गुदड़ी" अर्थात "भीम का गद्दा" माना जाता है ! ये सूचना इस मंदिर के पुजारी "शर्मा जी" ने दी ..शर्मा जी कुकुछीना से रोज दोपहर में चलकर शाम की पूजा करने पांडूखोली पहुंचते थे और करीब ६ बजे लौट जाते थे ! समझ नहीं आता की भगवान् को इतनी भी क्या मेहनत करवानी थी मनुष्य से की ऐसे दुर्गम जगहों पर आकर बसे !शायद जानता था कि मनुष्य खुद की पतन की तरफ बढेगा तो बेहतर है दूर-२ ही रहो इस से :) ..

उस पहाडी के शीर्ष पर बने उन दो कमरों में से एक कमरे की चाभी देकर शर्मा जी ने हमको पानी का इंतजामात दिखाया..एक कुआ था गहरा सा,दिखने में अच्छा जरूर लगता था मगर बरसाती पानी इकट्ठा था और उसमे भी बरसाती कीड़े .. पहली बार को तो लगा कि पीने वाले पानी का कुआ अलग होगा पर शर्मा जी बोले की यहाँ से कुछ 14-15 किमी दूर जंगल में "भरतकोट" पहाडी की तरफ पीने का साफ़ पानी है ! दूरी और जंगली रास्ते की वजह से ज्यादातर लोग इस पानी को ही छानकर और उबालकर पीते हैं ..पहली बारगी तो इंसान देख के उल्टी ही कर दे .. पर जटिल अनुभव,भविष्य को सुन्दर तरीके से देखने का मौक़ा भी देता है हमारे रवैये पर सब निर्भर है !


शर्मा जी के प्रस्थान के बाद सबसे पहला काम जो किया,वो था लकड़ी ढूंढने का ताकि रात को खाना बना सकें,अगस्त के महीने में दिसम्बर वाली ठण्ड थी यहाँ ! पहाडी की ऊँचाई का अंदाजा लगाईये कि 1998 में जब सारे बड़े शहरों पर FM रेडिओ नहीं आता था उस पहाडी पर वो 300 रूपये का FM रिसीवर (कश्मीरी गेट बस अड्डे पर आजकल ये काला छोटा डिब्बा सिर्फ 60 -70 रूपये में मिलता है ) ही हमारा एकमात्र मनोरंजन का साधन था ! वैसे इसके अलावा हम पाँचों ही बहुत प्रसिद्ध बेसुरे गायकार भी थे !

"पानी बनाकर" (अर्थात छानकर ,उबालकर ,फिर छानकर ) हम लोग चूल्हे में आग जलाना शुरू हुए कि आग जल ही न दे ..रोज की बरसात की वजह से लकडीयां गीली थी और हमारे पास लिमिटेड मिट्टी का तेल था .. एक माचिस का डिब्बा तकरीबन पूरा ख़त्म होने वाला था तब जाकर चुल्हा गरम हुआ और हमारी रसोई शाम के ८ बजे से साढ़े बारह बजे रात तक कुल पांच लोगों का भोजन बनाती रही ! दीए ने काफी साथ दिया मगर आपको रात्री के पहर में उस कक्ष में किसी को भी सू सू आ जाए तो क्या उपाय? सोचियेगा ? दीया तो बाहर की हवा में जलेगा भी नहीं ..
माचिस कि तिल्ली जला-जला कर एक दोस्त की नेचरस कॉल के उपाय हेतु पाँचों दोस्त बाउंड्री के बाहर जाते उस रेडियो को साथ लेकर,ताकि डर कम लगे,रात्री के २ बजे मंदिर परिसर से रानीखेत जो कि 60 -65 किमी दूर था ऐसा दीखता था जैसे बहुत गहराई में हो और हम खुद आसमां के तारों को छूं लेने की उचाईयों पर ! बहुत दूर किसी दूसरी पहाडी पर कुछ तारे से नजर आते थे,वो शायद एक काफी छोटा पहाडी गाँव और उस दूरस्थ स्थान पर भी बिजली होना बड़ी बात थी ! FM पर मधुर गीत "हुस्न पहाड़ों का क्या कहना की बारहों महीने यहाँ मौसम जाड़ों का " .. और इस जद्दोजहद के बीच माचिस की आखिरी तिल्ली भी खत्म.. उस अंधेरे में ही जाकर सो गये ..

अगली सुबह चाय तक नहीं बना सके थे पाउडर वाले दूध से और हम सब ये प्रार्थना कर रहे थे की " शर्मा जी वक़्त पर आ जाएँ औ भगवान् करें की वो बीडी-सिगरेट पीते हों " ,शर्मा जी करीब 12 -1 बजे पहुंचे और पहली बार किसी की बीडी पीने की आदत पर हमको इतनी खुशी हुई ,वरना 10 -12 किमी. नीचे जाकर माचिस लाना उफ़ क्या हाल होता !

बर्तन मांजना एक कष्टकारी काम था और इसका सरल उपाय ये निकाला गया कि टेनिस कि बॉल से मैच खेला जाएगा ! जग्गा,लम्बू और नाडू एक टीम में(नाडू कमजोर प्लयेर था इसलिए ) घोडा और मैं दूसरी टीम के सदस्य ! जो भी टीम मैच हारेगी बर्तन माँजेगी और जो टीम जीतेगी वो खाना बनायेगी ! एक दिन वो जीते और एक दिन हम ,कोई बल्ला लेकर नहीं गये थे किसी मोटी लकड़ी से ही ये गेम खेला जाता था !


अब लगता है रानीखेत में ही कितनी शांती और सूकून है तो फिर पांडूखोली में तो डर लगने लगेगा ! जो भी है वो तीन दिन केवल पांच दोस्तों के बीच,कितना मोहक सूकून था प्रकति की गोद में (कभी-२ डरावना भी) ! " हमारे मापदंड हमारी परिस्थितियों के हिसाब से बदल जाते हैं" यही वजह होगी कि उस छोटी सी उम्र में हम उस यादगार ट्रिप पर गये क्योंकी उस समय के मापदंड रानीखेत का जीवन था ! हमलोगों के दसवी पास होने के बाद की ट्रिप थी ये,शुरुआत में कुछ 15-16 लोग तैयार हुए थे और जाते-२ "नाडू" को मनाकर ले जाने के बाद भी केवल पांच ही बचे थे ! "पेरेंटिंग एक बहुत दुर्लभ कला है और हमारी पिताजी जानते थे कि कब ढील देनी है और कब खींच" इसका अहसास अब होता है ! वरना दसवीं के बच्चों को किसी भयावह जंगल और पहाडी पर 3 दिन के ट्रिप पर भेजना सबके बस की बात है भी नहीं !

चूंकी सीमित पैसे मिले थे और आते वक़्त कुकुछीना तक जीप बुक करवानी पडी ,क्योंकी कोई भी जीप वाला जाने को तैयार था नहीं कुकुछीना ,तो हमारे पास केवल इतनी पैसे बचे थे कि द्वाराहाट से जीप ले सकें ! कुकुछीना होते हुए रोड के रास्ते द्वाराहाट कुछ 30-35 किमी. था ! लम्बू के पैर में पिछले दिन मांसपेशी खींच गयी थी तो हम धर्म संकट में फँस गये ! अगर पहाडी रास्ता लिया जाए तो 20-25 किमी पडेगा ये पता था ,लम्बू ने भी मन बना लिया था कि वो बिना सामान के चल लेगा !यानि हम चारों बदल-२ कर उसका सामन ले जायेंगे ! सुबह 11 बजे हमारी वापसी शुरू हुई करीब २ बजे हम द्रोणागिरी ( बोलचाल में "दूनागिरी" बोला जाता है ) माता के मंदिर पहुंचे !

"पवनसुत हनुमान" जब संजीवनी लेकर लौट रहे थे तो "भरतकोट पहाड़ " पर तप में बैठे प्रभु राम के भ्राता "भरत" ने हनुमान जी पर तीर मारा और द्रोण पर्वत का एक हिस्सा यहाँ पर गिर गया इसीलिये यहाँ पर "द्रोणागिरी" माता का मंदिर स्थापित हुआ ! लाखों की संख्या में घंटियां हैं इस मंदिर में !
एक-सवा घंटे के विश्राम के पश्चात तकरीबन साढ़े तीन बजे चलकर हम लोग साढ़े पांच बजे द्वाराहाट पहुंचे और टेक्सी से साढ़े ६ बजे रानीखेत ! फिर ४ किमी चलकर,अगले एक घंटे में गाँव ! चूंकी लम्बू मेरे गाँव का ही था तो उसकी हालत काफी खाराब हो चुकी थी चल-२ कर और इसके बावजूद हम सबको ये आभास हो गया था कि जीवनपर्यंत ये "तीन दिन" स्मरणीय रहेंगे !
जग्गा,घोड़ा ,लम्बू और नाडू की याद में लिख ही डाला :) ,सब हैं कहीं न कहीं इस जग में पर मोती कभी-२ बिखर भी जाते हैं समय के थपेड़ों के सामने !आखिर बात तो सच ही है कि "बारीश और नोस्टाल्जिया(Nostalgia) में कोई महीन रिश्ता जरूर होता है,बारीक सा ! "

जगजीत सिंह की ग़ज़ल की दो लाईनें, आपको भी छूं जाए कौन जाने ?


एक पुराना मौसम लौटा ,याद भरी पुरवाई भी !
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हो तन्हाई भी !!